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Shimla News: पत्ती धब्बा रोग की चपेट में सेब बगीचे, समय से पहले झड़ रहीं पत्तियां

Sun, 27 Jul 2025 11:55 PM IST
Shimla Bureau शिमला ब्यूरो
Updated Sun, 27 Jul 2025 11:55 PM IST
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apple crop defected by disease
रोहडू, जुब्बल, कोटखाई और रामपुर के क्षेत्रों में तेजी से बढ़ रहा संक्रमण, बागवान परेशान
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संवाद न्यूज एजेंसी

शिमला। जिले के ऊपरी इलाकों में सेब के पौधे पत्ती धब्बा रोग (मार्मोनिना ब्लाच) की चपेट में आने शुरू हो गए हैं। इससे बागवानों की परेशानियां बढ़ गई हैं। यह रोग पत्तियों के समय से पहले गिरने और फलों की गुणवत्ता में कमी का मुख्य कारण बन रहा है।
मानसून का मौसम इस रोग के लिए अत्यधिक अनुकूल परिस्थितियां उत्पन्न कर रहा है। जिले के रोहड़ू, जुब्बल, कोटखाई और रामपुर क्षेत्र के बगीचों में यह संक्रमण तेजी से फैल रहा है। वहीं इस समय सेब सीजन भी चला हुआ है। जिन बगीचाें मे सेब अभी तैयार नहीं हुआ है, उसकी गुणवत्ता प्रभावित होनी शुरू हो गई है। इससे बाजार में सही दाम नहीं मिलेंगे। पत्तियों पर हल्के भूरे धब्बे जो धीरे-धीरे काले होकर फैल जाते हैं। अत्यधिक संक्रमण से पत्तियां विकृत हो जाती हैं और समय से पहले गिरनी शुरू हो जाती हैं। मार्सोनिना ब्लाच के प्रभावी प्रबंधन के लिए सेब उत्पादकों को एकीकृत दृष्टिकोण अपनाना चाहिए, जिसमें कल्चरल प्रैक्टिसेज और डॉ. वाईएस परमार औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय नौणी सोलन की वैज्ञानिक सिफारिशों के अनुसार फफूंदनाशकों का उचित छिड़काव शामिल है। कल्चरल प्रैक्टिसेज में पौधों के बीच उचित हवा के संचार में सुधार के लिए बगीचों की नियमित साफ-सफाई और पेड़ों के चारों ओर आर्द्रता को कम करने के लिए तोलियों की नियमित सफाई शामिल है, जो पत्तियों को शीघ्र सूखने में सहायक होती है और फफूंद के विकास के लिए प्रतिकूल वातावरण बनाती है।
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कोट्स
पत्ती धब्बा रोग से बचाव के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है कि बागवान सभी फफूंदनाशकों की अनुमोदित मात्रा और निर्धारित अंतराल का पालन करें, जो न केवल उपचार सुनिश्चित करता है बल्कि फलों पर हानिकारक अवशेषों के स्तर को न्यूनतम रखकर उपभोक्ता सुरक्षा भी सुनिश्चित करता है।
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-डॉ उषा शर्मा, वरिष्ठ वैज्ञानिक, कृषि विज्ञान केंद्र, शिमला


रोग से बचाव के लिए होने वाले प्राथमिक छिड़काव
रासायनिक नियंत्रण के लिए एक निवारक दृष्टिकोण अत्यधिक प्रभावी सिद्ध होता है। अखरोट के आकार के समय पर फ्लुक्सैपायरोक्सैड 250 जी/एल+पायराक्लोस्ट्रोबिन 250 जी/एल 500 एससी या फ्लुओपाइरम 17.7% डब्लू/डब्लू+टेबुकोनाजोल 17.7% डब्लू/डब्लू एससी या डोडीन 40% एससी का प्राथमिक छिड़काव करें। इसके पश्चात फल विकास अवधि के दौरान 18-21 दिनों के नियमित अंतराल पर प्रतिरोध विकास को रोकने के लिए विभिन्न फफूंदनाशकों का बारी-बारी से उपयोग करना आवश्यक है। इसमें टेबुकोनाजोल 50%+ट्राइफ्लोक्सीस्ट्रोबिन 25% डब्लूजी, फ्लुसिलाजोल 12.5% एससी, मैंकोजेब 60% +पायराक्लोस्ट्रोबिन 5% डब्लू/डब्लू डब्लूजी, मेटिराम 70% डब्लूजी, फ्लुओपाइरम 17.7% डब्लू/डब्लू + टेबुकोनाजोल 17.7% डब्लू/डब्लू एससी या जिराम 80% डब्लू पी का छिड़काव शामिल है।
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