निकाय चुनाव: जैसलमेर सभापति चुनाव में 25 बनाम 16 का गणित, क्या निर्दलीय बदलेंगे पूरा खेल?
जैसलमेर नगर परिषद के 45 सदस्यीय सदन में भाजपा ने 25 वार्ड जीतकर बहुमत हासिल किया है, जबकि कांग्रेस के 16 और निर्दलीय चार पार्षद हैं। सभापति पद के लिए भाजपा ने विजय डांगरा और कांग्रेस ने निर्मल पुरोहित को उम्मीदवार बनाया है। सभापति बनने के लिए 23 मत जरूरी हैं।
विस्तार
नगर परिषद के वार्डों के चुनाव परिणाम सामने आने के बाद अब जैसलमेर की सियासत का पूरा फोकस सभापति की कुर्सी पर है। 45 सदस्यीय नगर परिषद में भाजपा ने 25 वार्डों में जीत दर्ज कर बहुमत हासिल किया है, जबकि कांग्रेस के खाते में 16 और चार सीटों पर निर्दलीय प्रत्याशी विजयी हुए हैं। इसके बावजूद सभापति का चुनाव केवल दो उम्मीदवारों के बीच का मुकाबला नहीं माना जा रहा है। इसमें पार्षदों के समर्थन का गणित भी अहम रहेगा। सभापति चुनने के लिए 23 मतों की जरूरत होगी।
भाजपा ने सभापति पद के लिए उद्योगपति विजय डांगरा को मैदान में उतारा है। उनके लिए यह राजनीति में नई शुरुआत के तौर पर देखा जा रहा है। वहीं कांग्रेस ने वार्ड 33 से पार्षद का चुनाव हार चुके निर्मल पुरोहित को उम्मीदवार बनाया है। पुरोहित ने हाइब्रिड पद्धति के तहत सभापति पद के लिए नामांकन दाखिल किया था। नामांकन प्रक्रिया के बाद दोनों प्रमुख दलों के उम्मीदवारों को लेकर तस्वीर काफी हद तक साफ हो गई है।
25 बनाम 16 का गणित, सभापति के लिए चाहिए 23 वोट
नगर परिषद के 45 सदस्यीय सदन में सभापति पद के लिए किसी उम्मीदवार को कम से कम 23 मतों की जरूरत होगी। भाजपा के पास 25 पार्षद हैं, यानी बहुमत के आंकड़े से दो मत अधिक। कांग्रेस के पास 16 सीटें हैं, जबकि चार निर्दलीय पार्षद भी सदन में पहुंचे हैं। यही चार निर्दलीय पार्षद सभापति चुनाव के गणित में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। भाजपा के लिए अपने 25 पार्षदों को एकजुट रखना अहम होगा। दूसरी ओर कांग्रेस को अपने 16 पार्षदों के अलावा बहुमत तक पहुंचने के लिए कम से कम सात अतिरिक्त मतों की जरूरत होगी इसलिए चुनाव परिणाम आने के बाद भी दोनों दलों की राजनीतिक गतिविधियां जारी हैं। बातचीत, संपर्क और समर्थन जुटाने की कोशिशों पर अब नजर है। किस निर्दलीय पार्षद का झुकाव किस ओर है, इसे लेकर चर्चाएं जरूर हैं, लेकिन अंतिम स्थिति मतदान के दौरान ही स्पष्ट होगी।
नामांकन के बाद मुकाबले की तस्वीर हुई साफ
सभापति पद के लिए नामांकन प्रक्रिया के दौरान भाजपा और कांग्रेस की ओर से अन्य नाम भी सामने आए थे। कांग्रेस की तरफ से पूर्व सभापति अशोक सिंह तंवर और भाजपा की ओर से अरुण पुरोहित ने भी नामांकन किया था। बाद में तंवर के नामांकन वापस लेने की जानकारी सामने आई। वहीं अरुण पुरोहित के नामांकन वापस लेने की संभावना भी जताई गई थी। नामांकन और वापसी की प्रक्रिया पूरी होने के बाद सभापति पद के लिए विजय डांगरा और निर्मल पुरोहित के बीच मुकाबले की तस्वीर सामने आई है। हालांकि अंतिम उम्मीदवारों की आधिकारिक स्थिति निर्वाचन प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही पूरी तरह स्पष्ट मानी जाएगी।
चुनाव परिणाम के बाद शुरू हुआ सियासी इंतजार
जैसलमेर नगर परिषद के लिए सितंबर में मतदान हुआ था और 14 सितंबर को मतगणना के बाद परिणाम घोषित किए गए। परिणाम में भाजपा ने 25 वार्डों में जीत दर्ज की, जबकि कांग्रेस को 16 वार्डों में सफलता मिली और चार निर्दलीय प्रत्याशी भी विजयी हुए। नतीजों ने भाजपा को नगर परिषद में बहुमत दिलाया। इसके बाद सभापति पद के उम्मीदवार को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज हुईं। अब नजर इस बात पर है कि भाजपा अपने 25 पार्षदों को मतदान तक किस तरह एकजुट रखती है और कांग्रेस अपने 16 पार्षदों के अलावा अतिरिक्त समर्थन जुटाने के लिए क्या रणनीति अपनाती है।
बाड़ाबंदी के बीच पार्षदों के अज्ञातवास की चर्चा
सभापति चुनाव से पहले दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों की ओर से पार्षदों की बाड़ाबंदी किए जाने की चर्चा भी बनी हुई है। चुनाव के बाद विजयी पार्षदों को पार्टी स्तर पर एकजुट रखने की कोशिशों की बात सामने आई है। उन्हें जैसलमेर से बाहर अलग-अलग स्थानों पर ठहराए जाने की चर्चा भी है। नतीजों के बाद जहां चुनाव हार चुके प्रत्याशी अपने घर लौट गए, वहीं विजयी पार्षदों के अज्ञातवास में रहने की बात कही जा रही है। इसके पीछे सभापति चुनाव से पहले पार्षदों के संभावित पाला बदलने या दूसरे खेमे के संपर्क में जाने की आशंका को वजह बताया जा रहा है। हालांकि राजनीतिक दल इसे अपने पार्षदों के साथ समन्वय और रणनीति बनाने की प्रक्रिया बताते रहे हैं। निकाय चुनावों में बोर्ड गठन से पहले पार्षदों की बाड़ाबंदी राजस्थान की स्थानीय राजनीति में पहले भी देखने को मिलती रही है।
निर्दलीयों पर भी रहेंगी निगाहें
सभापति चुनाव में चार निर्दलीय पार्षदों की भूमिका चर्चा में है। भाजपा के पास 25 सीटों के साथ बहुमत है, इसलिए उसके लिए निर्दलीयों का समर्थन जरूरी नहीं है। लेकिन पार्टी के किसी पार्षद के समर्थन में कमी आती है तो अतिरिक्त मतों की जरूरत पड़ सकती है।
दूसरी ओर कांग्रेस के पास 16 पार्षद हैं। उसे बहुमत के 23 के आंकड़े तक पहुंचने के लिए सात और मत चाहिए। ऐसे में कांग्रेस के लिए चार निर्दलीयों के साथ-साथ भाजपा खेमे के पार्षदों की भूमिका भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो सकती है।
यही वजह है कि आने वाले दिनों में जैसलमेर की स्थानीय राजनीति में पार्षदों की गतिविधियों पर नजर रहेगी। किस खेमे के पास कितने पार्षद हैं और मतदान के समय कौन किसके साथ खड़ा होता है, इसका जवाब 21 सितंबर को होने वाले मतदान के दौरान सामने आएगा।
डांगरा के सामने 25 पार्षदों के समर्थन को वोट में बदलने की चुनौती
भाजपा के विजय डांगरा के पक्ष में मौजूदा चुनाव परिणामों का गणित 25 पार्षदों का है। लेकिन सभापति चुनाव में यह संख्या मतदान तक कायम रखना पार्टी के लिए महत्वपूर्ण होगा। वहीं कांग्रेस के निर्मल पुरोहित के सामने अपने 16 पार्षदों के साथ बहुमत के लिए जरूरी अतिरिक्त समर्थन जुटाने की चुनौती है। इस लिहाज से आने वाले दिन जैसलमेर नगर परिषद के लिए महत्वपूर्ण हैं। चुनाव परिणामों ने सदन का संख्याबल तय कर दिया है, लेकिन सभापति पद पर कौन चुना जाएगा, इसका अंतिम फैसला पार्षदों के मतदान से होगा।
21 सितंबर को मतदान, उसी दिन साफ होगी तस्वीर
जैसलमेर नगर परिषद के सभापति पद के लिए 21 सितंबर को सुबह 10 बजे से दोपहर 2 बजे तक मतदान होना है। मतदान के बाद मतगणना की जाएगी और परिणाम घोषित किया जाएगा। मतदान के साथ ही जैसलमेर नगर परिषद की नई राजनीतिक तस्वीर पूरी तरह साफ हो जाएगी। फिलहाल 25 भाजपा, 16 कांग्रेस और चार निर्दलीय पार्षदों के बीच सभापति चुनाव का पूरा गणित टिका हुआ है।