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शाही समाधियों का कब्जा दिलवाने से इंकार
अमर उजाला, फरीदकोट
Updated Thu, 13 Feb 2014 10:17 PM IST
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जिला अदालत ने फरीदकोट रियासत की संपत्ति की देखभाल कर रहे महारावल खेवा जी ट्रस्ट को रियासत की शाही समाधियों का कब्जा दिलवाने से इंकार दिया है।
वीरवार को जिला और सेशन जज अर्चना पुरी की अदालत ने शाही परिवार के महंत बलदेव दास की एक अपील को स्वीकार करते हुए ट्रस्ट के उस दावे को खारिज कर दिया जिसमें महंत से शाही समाधियों की जगह खाली करवाने की मांग की गई थी।
जानकारी के अनुसार महारावल खेवा जी ट्रस्ट ने 2000 के दौरान फरीदकोट अदालत में दावा दायर करते हुए खुद को शाही समाधियों की जगह का मालिक बताने वाले महंत बलदेव दास से शाही समाधियां खाली करवाने की मांग की थी।
महंत बलदेव दास का कहना था कि उनके परिवार ने यह जमीन देश आजादी होने के गठित हुई पेप्पू सरकार से खरीदी थी और उसी समय से यह जगह उनके परिवार के नाम पर है। उन्होंने अदालत के पास यह तर्क भी रखा कि रियासत के अंतिम शासक हरिन्द्र सिंह बराड़ भी 1989 तक जिंदा थे और उन्होंने भी कभी शाही समाधियों पर हक नहीं जताया।
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अदालत ने ट्रस्ट के दावा को खारिज करते हुए कहा कि इसे खाली नहीं करवाया जा सकता। ट्रस्ट के दावे को फरीदकोट की निचली अदालत ने मंजूर कर लिया था जिसके खिलाफ महंत बलदेव दास ने जिला अदालत में अपील दायर की थी। मालूम हो कि 6 कनाल 3 मरले रकबे में फैले शाही समाधि स्थल में फरीदकोट रियासत के शासकों की समाधि बनी हुई है।
शहर के बीचों बीच स्थित होने के कारण इस जमीन की कीमत करोड़ों रुपये को पार कर चुकी है। शाही संपत्ति की देखभाल कर रहे ट्रस्ट की तरफ से जगह को वापस लेने की कानूनी लड़ाई लड़ी जा रही है। इससे पहले चंडीगढ़ की एक अदालत की तरफ से कुछ माह पहले ही फरीदकोट रियासत के अंतिम शासक हरिन्द्र सिंह बराड़ की 1 जून 1982 को लिखी वसीयत को गैर कानूनी करार दिया जा चुका है।
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वीरवार को जिला और सेशन जज अर्चना पुरी की अदालत ने शाही परिवार के महंत बलदेव दास की एक अपील को स्वीकार करते हुए ट्रस्ट के उस दावे को खारिज कर दिया जिसमें महंत से शाही समाधियों की जगह खाली करवाने की मांग की गई थी।
जानकारी के अनुसार महारावल खेवा जी ट्रस्ट ने 2000 के दौरान फरीदकोट अदालत में दावा दायर करते हुए खुद को शाही समाधियों की जगह का मालिक बताने वाले महंत बलदेव दास से शाही समाधियां खाली करवाने की मांग की थी।
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महंत बलदेव दास का कहना था कि उनके परिवार ने यह जमीन देश आजादी होने के गठित हुई पेप्पू सरकार से खरीदी थी और उसी समय से यह जगह उनके परिवार के नाम पर है। उन्होंने अदालत के पास यह तर्क भी रखा कि रियासत के अंतिम शासक हरिन्द्र सिंह बराड़ भी 1989 तक जिंदा थे और उन्होंने भी कभी शाही समाधियों पर हक नहीं जताया।
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अदालत ने ट्रस्ट के दावा को खारिज करते हुए कहा कि इसे खाली नहीं करवाया जा सकता। ट्रस्ट के दावे को फरीदकोट की निचली अदालत ने मंजूर कर लिया था जिसके खिलाफ महंत बलदेव दास ने जिला अदालत में अपील दायर की थी। मालूम हो कि 6 कनाल 3 मरले रकबे में फैले शाही समाधि स्थल में फरीदकोट रियासत के शासकों की समाधि बनी हुई है।
शहर के बीचों बीच स्थित होने के कारण इस जमीन की कीमत करोड़ों रुपये को पार कर चुकी है। शाही संपत्ति की देखभाल कर रहे ट्रस्ट की तरफ से जगह को वापस लेने की कानूनी लड़ाई लड़ी जा रही है। इससे पहले चंडीगढ़ की एक अदालत की तरफ से कुछ माह पहले ही फरीदकोट रियासत के अंतिम शासक हरिन्द्र सिंह बराड़ की 1 जून 1982 को लिखी वसीयत को गैर कानूनी करार दिया जा चुका है।