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पंजाब में मरीजों पर दवाएं बेअसर: कीटनाशकों के अधिक इस्तेमाल से बढ़ा खतरा, एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस का डर

Wed, 19 Feb 2025 12:44 PM IST
निवेदिता वर्मा राजिंद्र शर्मा, अमर उजाला, चंडीगढ़
राजिंद्र शर्मा, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: निवेदिता वर्मा Updated Wed, 19 Feb 2025 12:44 PM IST
सार

मोहाली जिले के 77 घरों में एंटीबायोटिक उपयोग, कृषि पद्धतियों और पशुपालन पर यह स्टडी हुई है। रिपोर्ट के अनुसार, 71.4 परिवारों का प्राथमिक व्यवसाय कृषि है और गेहूं, मक्का व सब्जियों की सबसे अधिक खेती की जा रही हैं।

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Medicines ineffective on patients in Punjab Danger increased due to excessive use of pesticides
दवाएं - फोटो : Freepik.com

विस्तार

पंजाब में बड़े पैमाने पर फसलों में कीटनाशकों के उपयोग और लोगों में एंटीबायोटिक के इस्तेमाल से एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (एएमआर) का खतरा पैदा हो गया है। 

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इस स्थिति में शरीर पर दवाओं का असर कम हो जाता है, जिससे संक्रमण का इलाज भी मुश्किल हो जाता है और यह मृत्यु का कारण भी बन सकता है। पंजाब में इस समय गेहूं की फसल में 78.2 प्रतिशत किसान कीटनाशकों का उपयोग कर रहे हैं। पीजीआई के कम्यूनिटी मेडिसन विभाग की तरफ से जारी रिपोर्ट में इसका खुलासा हुआ है।
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रिपोर्ट के अनुसार एंटीबायोटिक दवाओं का अत्यधिक उपयोग, डेयरी क्षेत्र में बिना परामर्श के एंटीबायोटिक्स व फसलों में कीटनाशकों के इस्तेमाल से यह स्थिति पैदा हो रही है। इस चिंताजनक प्रवृत्ति को रोकने के लिए तत्काल उचित कदम उठाने की जरुरत पर जोर देते हुए कहा गया है कि इसके लिए लोगों में जागरुक्ता पैदा करना जरूरी है। 
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मोहाली जिले के 77 घरों में एंटीबायोटिक उपयोग, कृषि पद्धतियों और पशुपालन पर यह स्टडी हुई है। रिपोर्ट के अनुसार, 71.4 परिवारों का प्राथमिक व्यवसाय कृषि है और गेहूं, मक्का व सब्जियों की सबसे अधिक खेती की जा रही हैं। इनमें कीटनाशकों का उपयोग आम बात है। कीटनाशकों के उपयोग में किसान पूरी तरह से दुकानदारों पर निर्भर है। किसानों की तरफ से उगाई जाने वाले ज्यादातर फसलों की खपत स्थानीय स्तर पर ही होती है। खासकर प्याज व टमाटर की खेती तो सिर्फ घरों में ही उपभोग के लिए की जा रही है।

पशुओं के उपचार में भी एंटीबायोटिक दवाओं का अधिक इस्तेमाल

रिपोर्ट में सामने आया है कि पशुओं के उपचार में भी एंटीबायोटिक दवाओं का अधिक इस्तेमाल किया जा रहा है। 68.8 फीसदी परिवारों की तरफ से पशु पालन किया जा रहा है, जिसमें स्तनदाह की स्थिति में 50 फीसदी पशुओं का एंटीबायोटिक दवाओं से इलाज किया जा रहा है। स्तनदाह एक ऐसा रोग है, जिसमें गाय या भैंस के थन में सूजन पैदा होती है। पशु चिकित्सक सप्ताह में उपचार के दौरान 25 फीसदी पशुओं को एंटीबायोटिक्स देते हैं। इनके उपयोग के संबंध में भी जागरुक्ता जरुरी है। निजी डॉक्टर प्रतिदिन 45 में से पांच मरीजों को केवल लक्षणों के आधार पर एंटीबायोटिक्स लिखते
हैं।

पशुओं को किस तरह की दवाएं दे रहे, ग्रामीणों को जानकारी नहीं

सर्वे के दौरान सामने आया कि ग्रामीण को इस बात की जानकारी ही नहीं है कि वे अपने पशुओं को किस तरह की दवाएं दे रहे हैं। पशुओं को दिया जाने वाले हरे चारे में भी कीटनाशकों का छिड़काव किया जा रहा है, जिसे प्रदेश के अधिकतर क्षेत्रों में घरों या फिर पास के खेतों में उगाया जाता है। लोग बाहर से जो पशु चारा खरीद रहे हैं, उसमें भी एंटीबायोटिक्स होने की संभावना है, जिससे आगे और भी जोखिम बढ़ने का खतरा है। पीजीआई के कम्यूनिटी मेडिसन विभाग के प्रोफेसर डॉ. जेएस ठाकुर व उनकी टीम की तरफ से यह स्टडी की गई है। इसमें उन प्रथाओं का पता चला है, जो
एएमआर को बढ़ावा दे रही हैं।

फसलों में कीटनाशकों के उपयोग व मरीजों में एंटीबायोटिक के अधिक इस्तेमाल से पंजाब में एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस का खतरा पैदा हो गया है। इस पर अभी से ध्यान देने की जरूरत है। लोगों में बड़े स्तर पर जागरूकता अभियान चलाया जाना जरुरी है, ताकि इस खतरे को कम किया जा सके। -डॉ. जेएस ठाकुर, प्रोफेसर, कम्यूनिटी मेडिसन विभाग, पीजीआई।
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