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Punjab: बिना एफआईआर दर्ज किए पांच साल चली जांच, हाईकोर्ट नाराज; कहा-विजिलेंस की लापरवाही निंदनीय

Fri, 18 Apr 2025 09:52 AM IST
निवेदिता वर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: निवेदिता वर्मा Updated Fri, 18 Apr 2025 09:52 AM IST
सार

019 में शिकायत दर्ज करवाई गई थी, लेकिन विजिलेंस ब्यूरो ने इस पर कोई कार्रवाई नहीं की और पांच साल तक जांच के नाम पर मामला लटकाए रखा। याचिकाकर्ता को जांच में शामिल होने के लिए जब-जब बुलाया गया, वह पेश होता रहा। बिना एफआईआर दर्ज किए लगातार पूछताछ और जांच की जाती रही।

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Investigation went on for five years without filing an FIR, High Court angry
पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

भ्रष्टाचार के मामले में बिना एफआईआर पांच साल जांच करने के मामले में पंजाब स्टेट विजिलेंस ब्यूरो के रवैये पर हाईकोर्ट ने नाराजगी जाहिर की है। जस्टिस सुमीत गोयल की एकल पीठ ने कहा कि यह न केवल समझ से परे है, बल्कि निंदनीय भी है।
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कोर्ट ने विजिलेंस ब्यूरो के चीफ डायरेक्टर को हलफनामा दाखिल करते हुए यह बताने का आदेश दिया है कि एफआईआर दर्ज न करने के पीछे क्या कारण और औचित्य थे। हाईकोर्ट हरमीत सिंह सहगल की अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई कर रहा था। याचिकाकर्ता के खिलाफ धोखाधड़ी, जालसाजी सहित अन्य धाराओं में मामला दर्ज किया गया था। साथ ही भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7-ए भी इसमें जोड़ी गई है।
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वरिष्ठ अधिवक्ता एसके गर्ग नरवाना ने याचिकाकर्ता की ओर से दलील देते हुए कोर्ट को बताया कि 2019 में शिकायत दर्ज करवाई गई थी, लेकिन विजिलेंस ब्यूरो ने इस पर कोई कार्रवाई नहीं की और पांच साल तक जांच के नाम पर मामला लटकाए रखा। याचिकाकर्ता को जांच में शामिल होने के लिए जब-जब बुलाया गया, वह पेश होता रहा। बिना एफआईआर दर्ज किए लगातार पूछताछ और जांच की जाती रही।
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कोर्ट ने घटनाक्रम को चिंताजनक मानते हुए कहा कि 2019 में दी गई शिकायत के आधार पर एफआईआर मार्च 2025 में दर्ज की गई, यानी लगभग पांच साल बाद। अदालत ने इस स्थिति पर सवाल उठाते हुए कहा कि इतने लंबे समय तक जांच चलाते रहना और एफआईआर दर्ज न करना न केवल प्रक्रिया का दुरुपयोग है, बल्कि न्यायिक प्रणाली की गंभीर अनदेखी भी है।


कोर्ट ने याचिकाकर्ता को अंतरिम राहत प्रदान करते हुए निर्देश दिया कि वह 21 अप्रैल को सुबह 11 बजे संबंधित पुलिस थाने में जांच अधिकारी के समक्ष उपस्थित होकर जांच में सहयोग करे। इस आदेश के अंत में जस्टिस सुमीत गोयल ने विशेष रूप से इस देरी पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि विजिलेंस ब्यूरो जैसी संवेदनशील जांच एजेंसी से ऐसी लापरवाही अपेक्षित नहीं है और इसके पीछे के कारणों की पारदर्शी व्याख्या होनी चाहिए।
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