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मेडिकल सुविधा मिलती तो किसान न होते निशक्त
अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Tue, 03 Dec 2013 01:57 AM IST
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खेतों में होनेवाली दुर्घटनाओं में में 2566 मौतों का आंकड़ा चौंकाने वाला है, साथ ही इसका एक और मानवीय पहलू भी है। दुर्घटना में निशक्त हो चुके 89 फीसदी पीड़ितों का जीवन मुश्किल भरा हो गया है।
वे हीन भावना से ग्रसित हो गए हैं। इनमें से ज्यादातर पीड़ित अपनी दैनिक क्रियाएं करने योग्य भी नहीं रह पाते हैं। इंस्टीट्यूट फॉर डेवलपमेंट एंड कम्युनिकेशन (आईडीसी) के वरिंदर शर्मा के नेतृत्व में किए अध्ययन में दूसरा हिस्सा पीड़ितों के जीवन पर केंद्रित है।
उन्होंने पाया कि इनमें से बहुत से पीड़ितों खास तौर पर किसानों की शादी तक नहीं हो पाती। कई कपड़े बदलने, नहाने और बिना सहारे के खाना खाने के काबिल भी नहीं हैं। आसपास के समाज में ऐसे लोग बोझिल माने जाते हैं।
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ऐसे लोगों में हीन भावना पैदा हो चुकी है। अध्ययन में 89.2 फीसदी पीड़ितों ने इस बात को स्वीकार किया कि वे दैनिक काम भी स्वयं नहीं कर पाते हैं। 10.8 फीसदी ऐसे हैं जो काम कर सकते हैं।
इन सभी में फिर से दुर्घटना होने का डर स्थायी तौर पर घर कर जाता है। निशक्तता का एक बड़ा कारण समय पर मेडिकल सुविधा न मिलना बताया गया है। गांवों में मेडिकल सुविधा के नाम पर झोला छाप डाक्टर हैं।
अध्ययन में सामने आए तथ्यों के अनुसार केवल 8 फीसदी को ही अपने गांव में मेडिकल सुविधा मिल पाई। 84.62 फीसदी को औसतन पंद्रह किमी. दूर अस्पतालों में भर्ती करवाया गया। इन पर पांच सौ से लेकर एक लाख रुपये तक खर्च हुआ।
दिए गए सुझाव
- मशीनरी की क्वालिटी सुधारी जाए एवं सावधानी से इस्तेमाल हो।
- फार्म मशीनरी की लगातार मरम्मत सुनिश्चित की जाए।
-थ्रेसरों के इस्तेमाल के लिए प्रशिक्षण दिया जाए।
- प्रत्येक गांव में पढ़े लिखे लोगों पर आधारित एक ग्रुप को मूल मेडिकल फर्स्ट एड के लिए प्रशिक्षित किया जाए।
- हारवेस्टिंग सीजन के दौरान गांवों में डाक्टरों और पैरा मेडिकल स्टाफ पर आधारित मोबाइल वैन उपलब्ध करवाई जाएं।
- प्रत्येक क्षेत्र की जरूरत के अनुसार सांप काटने पर एंटी स्नैक टीके और हल्का रोकथाम के टीके उपलब्ध करवाए जाएं।
- बनावटी अंग रियायती दरों पर उपलब्ध करवाए जाएं।
- ट्राई साइकिल और क्रचों का प्रबंध किया जाए।
- वित्तीय सहायता योजना के लिए लाभ पात्रों की पहचान ग्राम सभा और कृषि अधिकारियों द्वारा सार्वजनिक तौर पर की जाए।
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वे हीन भावना से ग्रसित हो गए हैं। इनमें से ज्यादातर पीड़ित अपनी दैनिक क्रियाएं करने योग्य भी नहीं रह पाते हैं। इंस्टीट्यूट फॉर डेवलपमेंट एंड कम्युनिकेशन (आईडीसी) के वरिंदर शर्मा के नेतृत्व में किए अध्ययन में दूसरा हिस्सा पीड़ितों के जीवन पर केंद्रित है।
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उन्होंने पाया कि इनमें से बहुत से पीड़ितों खास तौर पर किसानों की शादी तक नहीं हो पाती। कई कपड़े बदलने, नहाने और बिना सहारे के खाना खाने के काबिल भी नहीं हैं। आसपास के समाज में ऐसे लोग बोझिल माने जाते हैं।
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ऐसे लोगों में हीन भावना पैदा हो चुकी है। अध्ययन में 89.2 फीसदी पीड़ितों ने इस बात को स्वीकार किया कि वे दैनिक काम भी स्वयं नहीं कर पाते हैं। 10.8 फीसदी ऐसे हैं जो काम कर सकते हैं।
इन सभी में फिर से दुर्घटना होने का डर स्थायी तौर पर घर कर जाता है। निशक्तता का एक बड़ा कारण समय पर मेडिकल सुविधा न मिलना बताया गया है। गांवों में मेडिकल सुविधा के नाम पर झोला छाप डाक्टर हैं।
अध्ययन में सामने आए तथ्यों के अनुसार केवल 8 फीसदी को ही अपने गांव में मेडिकल सुविधा मिल पाई। 84.62 फीसदी को औसतन पंद्रह किमी. दूर अस्पतालों में भर्ती करवाया गया। इन पर पांच सौ से लेकर एक लाख रुपये तक खर्च हुआ।
दिए गए सुझाव
- मशीनरी की क्वालिटी सुधारी जाए एवं सावधानी से इस्तेमाल हो।
- फार्म मशीनरी की लगातार मरम्मत सुनिश्चित की जाए।
-थ्रेसरों के इस्तेमाल के लिए प्रशिक्षण दिया जाए।
- प्रत्येक गांव में पढ़े लिखे लोगों पर आधारित एक ग्रुप को मूल मेडिकल फर्स्ट एड के लिए प्रशिक्षित किया जाए।
- हारवेस्टिंग सीजन के दौरान गांवों में डाक्टरों और पैरा मेडिकल स्टाफ पर आधारित मोबाइल वैन उपलब्ध करवाई जाएं।
- प्रत्येक क्षेत्र की जरूरत के अनुसार सांप काटने पर एंटी स्नैक टीके और हल्का रोकथाम के टीके उपलब्ध करवाए जाएं।
- बनावटी अंग रियायती दरों पर उपलब्ध करवाए जाएं।
- ट्राई साइकिल और क्रचों का प्रबंध किया जाए।
- वित्तीय सहायता योजना के लिए लाभ पात्रों की पहचान ग्राम सभा और कृषि अधिकारियों द्वारा सार्वजनिक तौर पर की जाए।