प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में तीन तलाक बिल पास होने पर मुस्लिम समाज की महिलाएं खुश हैं। लेकिन महिलाएं इसमें विसंगतियां भी बता रही हैं, जिसे दूर करने की मांग की है। बातचीत में मुस्लिम धर्म गुरू और बुद्धजीवियों, समाजसेवियों ने इसे जल्दीबाजी में लिया गया फैसला बताया है। साथ ही कहा है कि बिल पास कराने से पहले एक बार इस बारे में सरकार को सोचना चाहिए। पढ़ें आगे की स्लाइड्स में...
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नूर सबा
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बीएचयू की छात्रा नूर सबा ने बताया कि तीन तलाक पर सरकार सिर्फ अपनी राजनीतिक रोटी को सेंकने का काम कर रही है। सरकार मुस्लिम लॉ को कमजोर करने पर अमादा है। क्या चंद पैसे मिल जाने से या शौहर के जेल जाने से किसी तलाकशुदा की जिंदगी अच्छी हो जाएंगी।
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प्रो. आफाक अहमद आफाकी
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बीएचयू के उर्दू विभाग विभागाध्यक्ष के प्रो. आफाक अहमद आफाकी का कहना है कि संसद में जो बिल पास हुआ है उस पर एक बार फिर से सोचने की जरूरत है। इस बिल में कई तरह की विसंगतियां हैं। प्रथम दृष्टया यह बिल महिलाओं के पक्ष में ही लगता है। अगर सरकार को करना ही है तो मुस्लिम महिलाओं को आरक्षण उसी तरह दीजिए जैसे दलितों को।
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फरमान हैदर
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शिया जामा मस्जिद के प्रवक्ता फरमान हैदर ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के नकारने के बाद आखिर बिल पास कराने में क्या जल्दीबाजी थी, समझ से परे हैं। तीन तलाक कोई मसला नहीं है। मुंह से तीन तलाक कहने से न कभी हुआ है और न ही आगे होगा। सरकार को अगर मुस्लिम औरतों का भला करना है उनके हुनरमंदी को आगे बढ़ाएं।
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अब्दुल बातिन नोमानी
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शहर-ए-काजी अब्दुल बातिन नोमानी ने कहा कि तीन तलाक को लागू कराने की मांग तो लंबे समय से हो रही है लेकिन जिस तरह बिल को पास कराया गया है, वह जल्दीबाजी में लिया गया फैसला है। ऐसा लगता है जैसे इस्लाम के नियम और मुस्लिम पर्सनल ला के नियमों को दरकिनार किया गया। सरकार को दोबारा सोचने की जरूरत है।