लोकसभा चुनाव और अब यूपी विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद बसपा सुप्रीमो मायावती और समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव भाजपा से मुकाबले के लिए महागठबंधन बनाने के संकेत दे रहे हैं। अखिलेश ने शनिवार को घोषणा की कि वह झूठ के खिलाफ हम किसी से भी गठबंधन करने को तैयार हैं। इस गठबंधन के अपने फायदे और नुकसान हैं। आगे की पांच स्लाइड में जाने फायदे और फिर जानें नुकसान -
फायदा
बसपा सुप्रीमो मायावती और सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव के महागठबंधन से सबसे बड़ा फायदा पिछड़े, अतिपिछड़े, दलित अति दलित वोटो का ध्रुवीकरण। इससे करीब 52 फीसदी वोट दोनों दलों के पास आ सकता है। जो न केवल आगामी लोकसभा चुनाव बल्कि वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में निर्णायक साबित हो सकता है।
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मायावती
- फोटो : amar ujala
मायावती के सोशल इंजीनियरिंग के जवाब में इस विधानसभा चुनाव में अमित शाह ने गैर यादव ओबीसी और गैर जाटव दलित जातियों को अपने साथ जोड़ा। इसका नतीजा यह रहा है कि सपा और बसपा का सूबे से लगभग सफाया हो गया। अब अगर मायावती और अखिलेश एक साथ आ जाते हैं तो जाटव, मुस्लिम, यादव के साथ अन्य जातियां वापस आ सकती हैं।
राजनीतिक पंडितों की मानें तो सपा और बसपा के गठबंधन के बाद सूबे के गैर बीजेपी अन्य राजनीतिक दल उनके साथ आ सकते हैं। इसमें अजीत सिंह की लोकदल, निषाद पार्टी, पीस पार्टी आदि शामिल हैं। उनका मानना है कि सभी दलों के महागठबंधन से ही सूबे में केसरिया रथ को आगे बढ़ने से रोका जा सकता है।
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rahul akhilesh dimple
- फोटो : अमर उजाला
सपा-बसपा के महागठबंधन से मुस्लिम वोटों का बिखराव खत्म होगा। साथ ही उन्हें एक मजबूत विकल्प मिलेगा। हाल ही में संपन्न विधानसभा चुनाव में कई ऐसी सीटें थीं जहां मुस्लिम वोटों के बिखराव की वजह से सपा और बसपा चुनाव हार गईं। जबकि मायावती और अखिलेश दोनों ने ही बड़ी संख्या में मुसलमानों को टिकट दिया था।