कोरोना वायरस के कहर का सीधा असर मानव जीवन पर पड़ रहा है। इसके चलते देश में सैकड़ों साल पुरानी सांस्कृतिक परंपराएं भी टूट रही हैं। बनारस में भी कुछ ऐसा ही होने वाला है। नाटी इमली का विश्व प्रसिद्ध भरत मिलाप इस साल नहीं होगा। वहीं 237 साल से होती आ रही रामनगर की रामलीला भी कोरोना की वजह से नहीं हुई।
लक्खा मेले में शुमार है भरत मिलाप
काशी के नाटी इमली में भरत मिलाप मेला लक्खा मेले में शुमार है। रामलीला समिति के प्रबंधक मुकुंद उपाध्याय ने बताया कि लगभग 475 वर्ष पहले यहां रामलीला की शुरुआत भगवान राम के भक्त मेघा भगत ने की थी। 5 मिनट के भरत मिलाप को देखने के लिए लाखों लोग आते हैं। लेकिन, कोरोना वायरस संक्रमण के चलते इस बार इसका स्वरूप सांकेतिक कर दिया गया है। पहली बार ऐसा होगा कि भक्त लीला को देख नहीं पाएंगे।
दुर्गा पूजा में पहली बार स्थापित नहीं होगी प्रतिमा
अंग्रेजों के जमाने से शुरू हुई काशी की पहली दुर्गा पूजा में ढाई सौ सालों के इतिहास में पहली बार माता की प्रतिमा स्थापित नहीं की जा रही है। केंद्रीय पूजा समिति के अध्यक्ष तिलकराज मिश्र ने बताया कि करीब ढाई सौ साल पहले 1773 ईस्वी में बंगाली ड्योढ़ी से ही बनारस में सबसे पहले दुर्गा पूजा की शुरूआत हुई थी।
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फाइल फोटो
- फोटो : अमर उजाला
पूजा समिति के लोग गंगा की मिट्टी से ही माता की प्रतिमा, गणेश, कार्तिकेय और भगवान राम की प्रतिमाओं का निर्माण करते हैं। कोरोना संक्रमण के कारण इस बार प्रतिमा का निर्माण नहीं हो सका है। इसलिए समिति ने कलश स्थापना करके पूजन का निर्णय लिया है।
काशी नरेश करते हैं रामलीला का शुभारंभ
237 साल पुरानी रामनगर की रामलीला भी कोरोना की वजह से नहीं हो पाई। रामनगर की रामलीला कब शुरू हुई, इसका कोई स्पष्ट ऐतिहासिक साक्ष्य तो नहीं है, लेकिन कहा जाता है कि काशी नरेश उदित नारायण ने इसे शुरू कराया था। कई लोग रामलीला शुरू होने का समय 1780 के बाद भी मानते हैं।