वाराणसी की होली भी बरसाने की लट्ठमार और मिथिला की कीचड़ की होली की तरह ही विश्व प्रसिद्ध है। काशी में महाश्मशान पर होली खेलने का अड़भंगी अंदाज तो किसी से छुपा नहीं है। यहां पर मान्यता है कि महादेव लोगों के साथ होली खेलते हैं। भस्म भी ऐसा-वैसा नहीं, महाश्मशान में जलने वाले इंसानों के राख से तैयार होता है। आगे की स्लाइड्स में देखें तस्वीरें...
महादेव की नगरी काशी में सोमवार को होली का रंग दिखा। मणिकर्णिका महाश्मशान पर सोमवार की दोपहर होली का बड़ा अद्भुत नजारा रहा। एक तरफ चिताएं जलती रहीं तो दूसरी ओर बुझी चिताओं की राख और भस्म से साधु-संत और भक्तगणों ने जमकर होली खेली। डमरुओं, ढोल, मजीरे की धुन में भक्तों ने झूम-झूम कर नृत्य किया। हर हर महादेव के उद्घोष से महाश्मशान गूंजता रहा।
होरी खेलें मसाने में... के बोल पर होरी गूंजी तो लोग थिरकने से खुद को नहीं रोक सके। दुनिया के कई देशों के पर्यटक भी चिता की भस्म से होली खेलने के उन क्षणों के साक्षी बने। रविवार को गौरा का गौना कराने के दूसरे दिन सोमवार को मणिकर्णिका श्मशान पर होली देखने के लिए भीड़ उमड़ पड़ी। सोमवार दोपहर 12 बजे मशानेश्वर महादेव के मंदिर में भोग आरती हुई। इस दौरान सैकड़ों भक्त डमरू, त्रिशूल के साथ चिताओं की भस्म उड़ाकर होली खेलने लगे।
इसके पहले रविवार को रंगभरी एकादशी पर 354 साल पुरानी परंपरा निभाई गई। बाबा भी मां गौरा के गौने के लिए ससुराल पहुंचे थे। महंत आवास पर गीत-गवनई के साथ गौने की रस्में भी निभाई गईं। बाबा के अखंड दीप के खप्पर के काजल से माता गौरा के नैनों का श्रृंगार किया गया। मां अन्नपूर्णा के दरबार से आए सिंदूर से माता की मांग भरी गई।
मान्यता के अनुसार बाबा विश्वनाथ कैलाश पर्वत से चलकर राजसी स्वरूप में हिमपुत्री पार्वती का गौना कराकर कैलाश लाए थे। साथ ही यह भी मान्यता है कि गौना कराने के दूसरे दिन बाबा विश्वनाथ ने महाश्मशान पर अपने गणों के साथ होली खेली थी। उसी परंपरा का निर्वाह करते हैं काशी के लोग।