निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल, बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटत न हिय के सूल। अर्थात मातृभाषा की उन्नति बिना किसी भी समाज की तरक्की संभव नहीं है और अपनी भाषा के ज्ञान के बिना मन की पीड़ा को दूर करना मुश्किल है। हिंदी में ही ताकत है कि वह संपूर्ण भारत को एकसूत्र में पिरो सके।
हिंदी हैं हम: संपूर्ण भारत को एकसूत्र में पिरोती है हिंदी, समाज की तरक्की के लिए मातृभाषा की उन्नति जरूरी
साहित्यकार छतिश द्विवेदी ने बताया कि लेखन में देखा जाए तो बहुत कम लोग हैं जो पढ़े जा रहे हैं। आम आदमी में भाषा ज्ञान कमजोर हुआ है। विभिन्न भाषाओं के मिश्रण से संस्कृत निष्ठ हिंदी कमजोर हुई। हिंदी का दायरा जरूर बढ़ा है, लेकिन स्वरूप, संरचना विकृत हुई है। सरकार और संस्थाओं की तरफ से निष्ठा के साथ हिंदी को पोषित करने की जरूरत है। हिंदी ही एकमात्र भाषा है, जिसमें हम अपनी अभिव्यक्तियों को सहज ढंग से व्यक्त कर सकते हैं।
काशी में हिंदी ने दी मुझे मेरी जमीन
एंकर सौरभ चक्रवर्ती कहते हैं कि हिंदी ने ही काशी में मुझे मेरी जमीन दी है। आज मैं जहां खड़ा हूं, वह हिंदी की ही देन है। बांग्ला भाषी होने के बावजूद हिंदी के बड़े-बड़े मंचों के संचालन की जिम्मेदारी मुझे दी गई और मैंने हिंदी के बूते ही सभी के विश्वास को बनाए रखा। हिंदी में लेख खासकर व्यक्ति और पर्व पर, मुझे आकर्षित करते हैं। वर्तमान परिस्थितियों से जोड़कर लिखना मुझे सबसे ज्यादा पसंद है। शास्त्रीय संगीत, हिंदी कविताओं के पखवाड़े और साहित्य समारोहों में मुझे जो मंच मिला, वह हिंदी की बदौलत ही मिला। दरअसल, आपकी रुचि उस तरफ ही बढ़ती है, जहां आपको काम मिलता है। रेडियो में भी काम मिला तो हिंदी की ही बदौलत।
हिंदी से ही सुरक्षित रहेगी हमारी पहचान
शोध छात्रा आस्था वर्मा ने बताया कि भाषाएं हमारी पहचान होती हैं। भाषा के बिना समाज गूंगा ही नहीं, बल्कि मानसिक तौर पर गुलाम भी होता है। हिंदी हमारी पहचान है, इसलिए हिंदी का प्रयोग करना अपनी पहचान को सुरक्षित रखने की तरह है। बाजार और पूंजी के इस दौर में कुछ लोग हिंदी को अंग्रेजी भाषा की अपेक्षा कमतर मानने लगे हैं। आज हमारे देश के कुछ अंग्रेजी परस्त लोग अंग्रेजी व्यवहार भी करने लगे हैं। मैं अंग्रेजी के खिलाफ नहीं हूं, किंतु अपने देश को समझने के लिए हिंदी से बेहतर कोई भाषा नहीं है। हमें और बहुत कुछ करने की जरूरत है। बच्चा जिस भाषा में स्वप्न देखता है, वह उसकी मातृ भाषा होती है। इसलिए कॉन्वेंट स्कूलों में भी हिंदी या मातृभाषा को बढ़ावा देना चाहिए।
भाषा नहीं संपूर्ण संस्कृति है हिंदी
मंत्री संस्कार भारती के नाट्य निर्देशक सुमित श्रीवास्तव का कहना है कि हिंदी सिर्फ भाषा ही नहीं, बल्कि एक संस्कृति और सभ्यता है। इसी से हमारी संस्कृति का अस्तित्व भी है। रंगमंच पर भी हिंदी के नाटकों का अलग ही प्रभाव होता है। हिंदी के नाटक जो प्रभाव दर्शकों पर छोड़ जाते हैं, उसका वर्णन शब्दों में नहीं किया जा सकता। हिंदी ही वह माध्यम है, जिसके जरिए हम दर्शकों तक अपने संदेश आसानी से पहुंचा सकते हैं। हिंदी का उद्भव देवभाषा संस्कृत से हुआ जो इतनी समृद्ध और आधुनिक है कि उसे कंप्यूटर और कृत्रिम बुद्धिमत्ता में प्रयोग करने के लिए सबसे उपयुक्त भाषा माना जाता है।