गंगा यात्रा के बहाने राज्यपाल आनंदीबेन पटेल का कार्यक्रम क्षेत्र में लगने से चार माह पहले तक बाढ़ की त्रासदी झेलने वाले द्वाबावासियों को ये उम्मीद थी कि शायद इस कार्यक्रम के बहाने ही उन्हें एनएच 31 के किनारे आशियाना बनाकर बसने की मजबूरी से निजात मिल जाएगी।
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झोपड़ी में रहने को मजबूर गंगा बाढ़ के पीड़ित
- फोटो : amar ujala
उन्हें उम्मीद थी कि हो सकता है राज्यपाल के कार्यक्रम के महत्व को समझते हुए जिला प्रशासन उनके लिए घोषणा कर दें, लेकिन राज्यपाल ने गंगा की निर्मलता, अविरलता और स्वच्छता की तो बातें की, लेकिन उनके दूसरे स्वरूप यानी बाढ़ के पीड़ितों के घाव पर मरहम लगाना भूल गईं। बताते चलें कि दुबे के छपरा के लगभग 1000 लोग गंगा के बाढ़ से बेघर होकर झोपड़पट्टी में रहने को विवश हैं।
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द्वाबावासी निराश जरूर थे लेकिन फिर ये कहते फिर रहे थे कि राज्यपाल का क्या दोष है। उन्हें तो यहां की स्थिति के बारे में कोई जानकारी होगी नहीं। यदि जिला प्रशासन की नीयत साफ होती तो जिस जमीन पर अभी कुछ दिन पहले एसडीएम बैरिया ने जिला प्रशासन का नाम चढ़वाया है उसी पर बाढ़ पीड़ितों को बसाने की घोषणा राज्यपाल से करा सकता था।
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मौजा सोनबरसा के लालगंज डाक बंगला के पास की इस जमीन को वर्षों पहले बाढ़ पीड़ितों को बसाने के उद्देश्य से ही जिला प्रशासन ने अधिगृहीत किया था। उस समय कुछ लोगों को बसाया भी गया था, लेकिन कई वहां रहने नहीं गया।
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इसके बाद बची जमीन पर लोगों ने कब्जा जमा लिया था, बाद में जानकारी के बाद तहसील प्रशासन ने अपना नाम तो चढ़वा लिया, लेकिन अभी तक उस जमीन को लेकर कोई निर्णय नहीं लिया गया है कि वहां बाढ़ पीड़ितों को बसाया जाएगा या नहीं। संबंधित लोगों ने भी अपनी गलती मानते हुए जमीन पर मालिकाना हक छोड़ दिया।