कोरोना महामारी से जूझ रही दुनिया के लिए केतु ग्रह के गोचर से कुछ राहत मिलने के आसार हैं। काशी के ज्योतिषाचार्यों का दावा है कि केतु का गोचर विश्व भर में बदलाव लेकर आयेगा। उनकी गणना के अनुसार इस दौरान कोरोना महामारी पर लगाम लगेगी और इससे जुड़े नए शोध भी सामने आ सकते हैं। वहीं द्वादश राशियों पर इसका मिलजुला प्रभाव नजर आएगा। केतु का गोचर इस वर्ष किसी राशि में तो नहीं होगा अर्थात् यह राशि परिवर्तन तो नहीं करेंगे लेकिन अब यह ज्येष्ठा नक्षत्र से निकलकर अनुराधा नक्षत्र में प्रवेश करेंगे।
यदि इस गोचर के समय और तिथि की बात की जाए तो केतु अपनी वक्री गति से चलते हुए दो जून 2021 को ज्येष्ठा नक्षत्र के प्रथम चरण से निकलकर अनुराधा नक्षत्र के चतुर्थ चरण में प्रवेश करे चुके हैं। काशी विद्वत परिषद के संगठन मंत्री पंडित दीपक मालवीय का कहना है कि केतु का गोचर अनुराधा नक्षत्र में होगा। इस नक्षत्र के स्वामी शनि देव हैं। शनिदेव भी त्यागी और तपस्वी अर्थात् विरक्ति की प्रकृति वाले ग्रह हैं। ऐसे में शनि के नक्षत्र में केतु का गोचर विशेष परिणाम देने वाला साबित होगा।
केतु ग्रह को अध्यात्म, रहस्यमई दुनिया, एकाकीपन के लिए जाना जाता है जबकि अनुराधा नक्षत्र हमारे हृदय की महत्वाकांक्षाओं को दर्शाता है। यह गोचर वृश्चिक राशि में ही है जोकि मंगल के आधिपत्य की राशि है। वृश्चिक राशि स्वयं काल पुरुष की कुंडली के अष्टम भाव की राशि होने के कारण गुप्त कार्यों को दर्शाती है।
ज्योतिषाचार्य दैवज्ञ कृष्ण शास्त्री ने बताया कि केतु का अनुराधा नक्षत्र में गोचर करना किसी भी व्यक्ति के पूर्व जन्म की अपूर्ण इच्छा को पूर्ण करने की ओर इशारा करता है अर्थात् इस गोचर के कारण किसी व्यक्ति की यदि कोई पुरानी इच्छा बची हुई है तो वह पूर्ण होने की संभावना बनती है। शोध संबंधित कार्यों में, आध्यात्मिक कार्यों में, ज्योतिष संबंधित कार्यों में और खोजी प्रवृत्ति के कार्यों में यह केतु बहुत अधिक सफलता प्रदान कर सकते हैं।
वहीं दूसरी तरफ, रिश्तों के लिए केतु का यह गोचर अधिक अनुकूल नहीं है और रिश्तों में तनाव बढ़ाने का काम कर सकता है। पंडित मालवीय की गणना के अनुसार स्वतंत्र भारत की कुंडली की बात करें तो वृषभ लग्न और कर्क राशि की कुंडली में वर्तमान समय में केतु का गोचर सप्तम भाव में वृश्चिक राशि में चल रहा है। इस गोचर के प्रभाव से भारत के व्यावसायिक संबंधों पर असर पड़ सकता है।
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जिन राष्ट्रों के साथ भारत के व्यावसायिक संबंध हैं, वे कुछ गुप्त नीतियां अपना सकते हैं। इसके विपरीत, भारत भी अपनी ओर से कुछ गुप्त नीतियों पर काम करेगा। देश में आध्यात्मिक गतिविधियों और उन की आड़ में सांप्रदायिक संघर्ष का माहौल बन सकता है। देश और दुनिया के लिए यह समय बहुत ज्यादा अनुकूल नहीं कहा जा सकता है क्योंकि इसके प्रभाव से आपसी संघर्ष और एक दूसरे के देश में जासूस भेजने का काम बढ़ सकता है।