सिद्धार्थनगर जिले के शोहरतगढ़ का महला गांव सात मौतों के दर्द से कराह रहा है। शनिवार की काली रात यह गांव कभी नहीं भूल पाएगा। जैसे ही सूरज निकला लोग पीड़ित परिवारों को ढांढस बंधाने पहुंचे। लोगों को देखकर उनकी चीख-पुकार तेज हो गई। इस हादसे ने किसी के लाल को छीन लिया तो किसी का सुहाग चला गया। किसी के पिता तो किसी बहन का भाई चला गया।
UP News: शादी के घर में छाया मातम, सात बरातियों की मौत से गमगीन हुआ गांव, हर तरफ मची है चीख पुकार
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शोहरतगढ़ थाना क्षेत्र के महला गांव में छह और खम्हरिया में एक घर के परिजनों की चीत्कार से गांव समेत आसपास के गांवों में मातम पसर गया। महला निवासी मृतक कमलेश उर्फ पिंटू (36) की पत्नी रीमा देवी, माता सुशीला देवी, पिता शिवपूजन, भाई राकेश, अखिलेश, दुर्गेंश सड़क हादसे में हुए मौत की खबर सुनकर रोते-बिलखते रहे। उनकी पत्नी रो-रोकर बेहोश हो जा रही थीं। मृतक कमलेश के तीन बच्चे सलोनी (6) आयुष (3) और एक वर्षीय लाडो मां रीमा देवी को बेहोशी हालत में देखकर चिल्ला रहे थे। कमलेश दिल्ली व मुंबई जा कर दिहाड़ी मजदूरी और खेती के समय खेती करता था। एक महीना पहले गांव आया था।
वहीं, मृतक मुकेश पाल (35) की पत्नी बीना, पिता विभूति पाल, भाई गोरख, पुत्र बालकेश्वर (7) शैलेश कुमार (11) सड़क हादसे की खबर सुनकर दहाड़ें मारकर रोने लगे। मुकेश घर पर रह कर खेती-बारी करते थे। मृतक रवि पासवान (18) के घर वाले बिलख रहे थे। सड़क हादसे की खबर मिलते ही पिता राजाराम पासवान, माता विलायती रोने-बिलखने लगीं। रोते हुए मां कहती रही कि बेटा बरात में न जा। मेरे रोकने के बाद भी नहीं माना। अगर न गया होता तो ये बुरा दिन नहीं आता। अब मेरा बेटे कहां है? कोई उसे क्यों बुला नहीं रहा है। यह कह-कह कर मां बेहोश हो जा रही थी।
मृतक रवि ने इंटर की परीक्षा दी है। एक भाई अजय है, जो अभी पढ़ रहा है। शिवसागर (14) के घर पर लोगों की भीड़ रही। रात में ही सड़क हादसे में मौत की खबर सुनकर मां अकाली, पिता प्रभुनाथ, भाई गोविंद, कैलाश और बहन चांदनी व बबली दहाड़ें मारकर रोने-बिलखने लगीं। शिवसागर अभी पढ़ रहा था। उससे परिवार को बहुत उम्मीदें थीं लेकिन हादसे में उसकी जान चली गई।
वहीं, लाल चंद्र (26) घर पहुंचे तो इधर-उधर लोग रोते हुए दिखे। मौत की खबर सुनने के बाद पत्नी सबिता, मां आरती, पिता फूलचंद, भाई दीपचंद्र, दीपक और कन्हैया रोने-बिलखने लगे। पत्नी साबिता रोते-रोते कई घंटों तक बेहोश रही। उसके गोद में तीन माह के पुत्र छोटू और तीन वर्षीय आयुष मां के पास बैठकर कर चीख रहे थे। ग्रामीण तीन माह के बच्चे को गोद में उठाकर उसे चुप करा रहे थे। लालचंद घर रह कर खेती और दिहाड़ी मजदूरी करते थे। परिवार को चलाने में उनका अहम योगदान था। उनकी मौत के बाद परिवार बेसहारा हो गया।