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शर्मनाक: तीन-तीन हजार देकर ट्रकों में लदे, बीच रास्ते में उतारा
Wed, 20 May 2020 12:47 AM IST
विनोद सिंह
न्यूज डेस्क, अमर उजाला ब्यूरो, प्रतापगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला ब्यूरो, प्रतापगढ़
Published by: विनोद सिंह
Updated Wed, 20 May 2020 12:47 AM IST
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- फोटो : pratapgarh
लॉकडाउन में मुंबई-गुजरात में फंसे मजदूरों ने भोजन और पैसे की दिक्कत होते देख किसी भी हालत में घर पहुंचने की ठान ली। जिसके पास जो भी रुपये थे उसे इकट्ठा कर ट्रकों में भूसे की तरह लद गए, लेकिन चालकों ने उन्हें बीच में ही उतार दिया। कोई रास्ता न देख वह पैदल ही घर के लिए चल दिए। मंगलवार को भी हाइवे और जगहों पर तपती दोपहरी में मजदूर पैदल ही घर जाते दिखे। अपना दर्द बयां करते हुए कहा कि कोरोना से डरते तो फिर भूखे मरते।
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प्रयागराज-अयोध्या राजमार्ग हो या वाराणसी-लखनऊ हाइवे ट्रक सवार लोगों के साथ ही पैदल भी प्रवासी मजदूर अपने घर के लिए चले जा रहे हैं। कहीं रास्ते में वाहन उतार दे रहा है तो सभी पैदल ही घर की ओर चल पड़ रहे हैं। प्रवासी मजदूरों का कहना है कि कहीं कोई मदद नहीं मिल रही है। रुपये, राशन सब खत्म हो गया। हाइवे पर मिले रायबरेली निवासी अमित कुमार व उसकी पत्नी सुमित्रा ने बताया कि जो रुपये बचे थे उससे ट्रक का किराया दे दिया।
ट्रक चालक ने घर तक पहुंचाने के बजाए भुपियामऊ चौराहे पर ही उतार दिया। वह पांच दिन पहले मुंबई से निकले थे। तीन हजार रुपये देकर ट्रक पर सवार हुए। इसके पहले बच्चों को साथ लेकर दो सौ किमी पैदल सफर करना पड़ा था। बस किसी तरह घर पहुंचना है। यदि कोरोना से डरते तो भूख से जान चली जाती।
ट्रक चालक ने घर तक पहुंचाने के बजाए भुपियामऊ चौराहे पर ही उतार दिया। वह पांच दिन पहले मुंबई से निकले थे। तीन हजार रुपये देकर ट्रक पर सवार हुए। इसके पहले बच्चों को साथ लेकर दो सौ किमी पैदल सफर करना पड़ा था। बस किसी तरह घर पहुंचना है। यदि कोरोना से डरते तो भूख से जान चली जाती।
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गुजरात के वापी से कंटेनर में बैठकर अंबेडकर नगर जा रहे राजकिशोर वर्मा, अमृतलाल, कैलाशी देवी ने बताया कि वह सभी एक कंपनी में काम करते थे। दो महीने जैसे-तैसे गुजार लिए। अब कुछ दिन और रुकते तो खाने के लिए भी कुछ न मिलता। बाहर निकलने पर पुलिस की लाठियां मिल रही थीं। रात के अंधेरे में गलियों से होकर 70 किमी पैदल चलने के बाद मुख्य मार्ग पर आ सके। वहां बाहरी लोगों के लिए कोई राहत का इंतजाम नहीं है। इसलिए घर की राह पकड़नी पड़ी।
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