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मुजफ्फरनगर दंगा: जिक्र छिड़ते ही पीड़ितों की आंखों से छलक पड़ते हैं आंसू, जानिए क्या थी दंगें की असली कहानी

Sat, 07 Sep 2024 04:04 PM IST
डिंपल सिरोही न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुजफ्फरनगर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुजफ्फरनगर Published by: डिंपल सिरोही Updated Sat, 07 Sep 2024 04:04 PM IST
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Muzaffarnagar riots: tears in the victims eyes, pain is still alive in their hearts
मुजफ्फरनगर दंगा - फोटो : अमर उजाला

11 साल बीतने के बावजूद मुजफ्फरनगर दंगे का दर्द दिलों में जिंदा है। यह दंश दोनों पक्षों ने झेला। घरों को छोड़ यहां-वहां बसे सैकड़ों परिवार सामान्य जिंदगी के लिए जद्दोजहद में हैं। अपनों को खो देने वाले परिवारों के जख्म भी ताजा हैं और जिक्र आते ही दर्द छलक उठता है। अगली स्लाइडों में तस्वीरों के साथ जानिए पूरा अपडेट-

Muzaffarnagar riots: tears in the victims eyes, pain is still alive in their hearts
मुजफ्फरनगर दंगा पीड़ित - फोटो : अमर उजाला
मुजफ्फरनगर में शाहपुर से सटे गांव पलड़ा में कुटबा, कुटबी और दुल्हैरा से विस्थापित हुए करीब 250 परिवार बसे हैं। सपा सरकार ने इन्हें पांच-पांच लाख रुपये का मुआवजा दिया था, जिससे जमीन खरीदकर लोगों ने अपने मकान बना लिए। बस्ती में घुसते ही कय्यूम के मकान में यूनुस और फुरकान बातचीत करते नजर आते हैं। दंगे का जिक्र आते ही कहते हैं कि उन्होंने जो झेला है वह किसी को न झेलना पड़े। मकान तो मिल गए, लेकिन रोजगार के लिए जद्दोजहद करनी पड़ रही है।
Muzaffarnagar riots: tears in the victims eyes, pain is still alive in their hearts
कवाल गांव का नलकूप - फोटो : अमर उजाला

खंडहर हो रहे विस्थापितों के घर
दंगे के दौरान विस्थापित हुए परिवारों के गांवों में स्थित घर खंडहर हो रहे हैं। कुटबा से जाकर पलड़ा एवं शाहपुर में बसे लोगों के घरों पर ताले लटके हैं। यहां स्थित एक मस्जिद पर भी ताला लगा है। पलड़ा में रह रहे परिवारों के सदस्य कहते हैं कि कभी कभार गांव में चले जाते हैं, लेकिन अब वहां रहना नहीं चाहते।

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झुग्गियों में रह रहे परिवार - फोटो : अमर उजाला

झुग्गियों में जीवन गुजार रहे कई परिवार 
काकड़ा, दुल्हैरा, भौराकलां, सिसौली, कुटबा और कुटबी से विस्थापित हुए 250 से ज्यादा परिवार शाहपुर कस्बे से उत्तर-पूर्व की ओर तंबू लगाकर रहने लगे थे। इनमें से ज्यादातर ने तो मुआवजा मिलने के बाद जमीन खरीदकर मकान बना लिए, लेकिन अभी भी 100 से ज्यादा परिवार झुग्गियों में रह रहे हैं। दंगा पीड़ित संघर्ष समिति के अध्यक्ष सलीम कहते हैं कि किसी परिवार के चार भाइयों में से एक को मुआवजा मिल गया, लेकिन बाकी तीन के परिवार झुग्गियों में ही रह गए। शौकीन, रक्खी, गुलशान, हारून, नौशद, गुलजार एवं महबूब आदि के परिवार झोपड़ियों में रह रहे हैं।

यह भी पढ़ें: दंगे की भूल: दिल में चुभ रही बनकर शूल, दर्ज हुए 534 मुकदमे, दो में आया फैसला, मुजफ्फरनगर में अब ऐसा है माहाैल

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सूने पड़े मकान - फोटो : अमर उजाला

गांव कवाल में 26 अगस्त 2013 को मलिकपुरा निवासी गौरव और कवाल निवासी मुजस्सिम के बीच बाइक साइकिल से टकराने पर कहासुनी हो गई थी। इसी विवाद में अगले दिन मुजस्सिम, उसके साथी शाहनवाज और गौरव, उसके ममेरे भाई सचिन के बीच मारपीट हो गई, जिसमें गौरव व सचिन की पीट पीटकर हत्या कर दी गई थी।

इसके बाद घायल शाहनवाज ने भी अस्पताल में दम तोड़ दिया था। 28 अगस्त को सचिन और गौरव के अंतिम संस्कार से लौट रही भीड़ ने कवाल में पथराव और आगजनी कर दी थी। इस मामले में 30 अगस्त को शहर के खालापार में जुम्मे की नमाज के बाद दूसरे समुदाय की भीड़ ने डीएम और एसएसपी को ज्ञापन दिया था तो दूसरे पक्ष ने सचिन और गौरव की हत्या के मामले में कार्रवाई के लिए 31 अगस्त को नगला मंदौड़ में पंचायत बुला ली थी। सात सितंबर को फिर से इस मामले में नगला मंदौड़ में पंचायत हुई। पंचायत से लौट रहे लोगों पर हमले के बाद जिले में दंगा भड़क गया था।

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