अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुर्खी बने कवाल कांड को आठ साल बीत चुके हैं। आज गांव के हालात सामान्य हैं, ग्रामीण रोजमर्रा की दिनचर्या में व्यस्त हैं। बाजारों में चहल पहल है। ग्रामीण एक-दूसरे से आपस में बातचीत करते दिखाई देते हैं। गांव का माहौल बिल्कुल सामान्य है। कड़वी याद समझकर लोग उस दिन को भूलना चाहते हैं।
कवाल कांड के आठ साल: पूरी दुनिया में गूंजा था मामला, दो परिवारों ने खोए थे तीन जवान बेटे, पढ़िए अब कैसे हैं हालात
जवान बेटों की मौत का गम दिल से नहीं निकलता
कवाल से तीन किलोमीटर दूर बसा मलिकपुरा मजरा में रहने वाले रविंद्र के पुत्र गौरव और बिशन के पुत्र सचिन की हत्या हुई थी। रविंद्र अपनी पत्नी सुरेश के साथ शहर में रहने लगे। उनकी दोनों बेटियों निति और शैली की शादी हो चुकी हैं। मृतक सचिन के पिता बिशन और उनकी पत्नी मुनेश और छोटा बेटा राहुल मलिकपुरा में ही रहते हैं। मृतक सचिन की मां मुनेश कहती हैं, उन्होंने दो जवान बेटे खो दिए। उनकी हत्या को भुलाने की कोशिश करते हैं, लेकिन दोनों बेटों का गम दिल से नहीं निकलता है। छोटा भाई राहुल कहता है, बड़े भाई सचिन की मौत का गम ताउम्र ही रहेगा। मुनेश ने बताया बहू स्वाति पौत्र गगन को लेकर अपने मायके पुरबालियान में रह रही है।
मुझे इंसाफ नहीं मिला: सलीम
कवाल कांड में कवाल निवासी सलीम ने भी अपने बेटे शाहनवाज को खो दिया था। सलीम बूढ़े हो चले हैं, लेकिन घटना की एक-एक बात आज भी उनको याद हैं। सलीम कहते हैं कि कोर्ट से उनको उम्मीद थी कि बेटे शाहनवाज के हत्यारोपियों को सजा जरूर मिलेगी। सभी नामजद हत्यारोपियों को जमानत मिल गई। उनका कहना है कि उसे अभी इंसाफ नहीं मिला। भाजपा सरकार ने भी उसकी कोई मदद नहीं की।
कवाल में अब किसी तरह का कोई मामला नहीं है। 2013 की घटना को ग्रामीण भूल चुके हैं। गांव में सबकुछ सामान्य है। सभी ग्रामीण आपस में सौहार्दपूर्ण तरीके से रह रहे हैं। - मोहम्मद तैय्यब
कवाल में सभी ग्रामीण आपस में बातचीत करते हैं। एक-दूसरे के घर भी आते जाते हैं। 2013 की घटना के बारे कोई जिक्र भी नहीं करते हैं। उस घटना को ग्रामीण अपने दिलों से निकाल चुके हैं। - मोहम्मद युनुस
कवाल में प्रतिदिन बाजार खुलते हैं। बाजारों में चहल पहल रहती है। कवाल कांड को सभी ग्रामीण धीरे-धीरे भुलाते जा रहे हैं। गांव में धार्मिक कार्यक्रम भी आयोजित होते हैं। - सुरेश चंद सैनी
गांव कवाल आपस में भाईचारे के नाम से जाना जाता रहा है। 2013 की घटना से आपसी सौहार्द जरूर खराब हुआ था, लेकिन आज फिर से पहले जैसा माहौल गांव में है। कवाल कांड को कोई याद नहीं करता है। - नरेश