मुजफ्फरनगर में भाकियू के राष्ट्रीय प्रवक्ता पर दर्ज मुकदमे और कृषि कानून के विरोध में महापंचायत में उमड़ी भीड़ ने किसान आंदोलन को तो संजीवनी दी ही है, साथ ही सियासी समीकरणों में उलटफेर के संकेत भी दिए हैं।
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नरेश टिकैत, जयंत चौधरी
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आठ साल पहले जिले में भड़के दंगे के बाद पहली बार भाकियू के बैनर तले विपक्षी दलों ने गिले-शिकवे भूलकर एक साथ मंच साझा किया। विपक्षी पार्टियों के बड़े मुस्लिम चेहरे भी मंच पर थे। भाकियू अध्यक्ष नरेश टिकैत ने भी चौधरी अजित सिंह को हराने को अपनी भूल बताकर भाजपा के खिलाफ लामबंदी की कोशिश की। इन बदलते सियासी समीकरणों ने भाजपा के लिए मुश्किलें बढ़ा दी हैं।
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जयंत चौधरी
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मुजफ्फरनगर दंगे के बाद पहली बार ऐसा मौका आया, जब रालोद, सपा, बसपा और कांग्रेस के साथ मुस्लिम किसान नेताओं ने मंच साझा किया है। सात सितंबर, 2013 में मुजफ्फरनगर और शामली में हुई हिंसा में 65 से ज्यादा बेगुनाहों की मौत ही हुई थी। पचास हजार से ज्यादा लोगों ने गांव छोड़कर शिविरों में शरण ली थी।
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kisan mahapanchayat
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आपसी अविश्वास बढ़ता गया और वेस्ट यूपी में राजनीति के नए समीकरण बनते गए। राष्ट्रीय लोकदल का जाट-मुस्लिम वोट गणित ध्वस्त हो गया। ध्रुवीकरण के दम पर भाजपा नई ताकत बन गई। चाहकर भी बीते आठ साल में ऐसा कोई अवसर नहीं नजर आया, जब जाट और मुस्लिम तथा अन्य विपक्षी दलों के नेता एकमंच पर एकजुट हुए हों।
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- फोटो : farmers protest up, किसान आंदोलन
ट्रैक्टर रैली के दौरान दिल्ली में हुए उपद्रव के बाद गाजीपुर बॉर्डर पर योगी सरकार के कड़े तेवर और भाकियू के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत के आंसुओं ने दंगे से बनी खाई भरने का मौका भी दे दिया। महापंचायत में पूर्व सांसद अमीर आलम और उनके बेटे पूर्व विधायक नवाजिश आलम पहुंचे। दंगे की वजहों को लेकर अखिलेश सरकार में अमीर आलम बड़े सवालों के घेरे में थे। फिलहाल वे रालोद में हैं।