मुरादाबाद के ग्राम पंचायत वरबाला खास में चार दिन पहले कोसी नदी के उफनाने से आई बाढ़ के बाद लोगों के घरों व अधिकांश रास्तों पर भरा बाढ़ का पानी तो उतर गया, लेकिन उससे हुई बर्बादी के निशान दीवार से लेकर लोगों के दिलों तक पर साफ दिखाई दिए। 200 से अधिक घरों में रहने वाले सैकड़ों लोग अभी भी छतों पर गुजर बसर करने को मजबूर हैं। घरों में बाढ़ के पानी के साथ आई मिट्टी कीचड़ और दलदल में तब्दील हो चुकी है। अभी भी सैकड़ों परिवार खाना बदोशों सा जीवन गुजार रहे हैं। सरकारी इमदाद के नाम पर अधिकांश परिवारों को किसी तरह की कोई राहत सामग्री नहीं मिल सकी है, हालांकि आज चौथे दिन एक लेखपाल गांव में उन कुछ परिवारों की सूची जरूर बनाता मिला जिनके मकान बाढ़ से क्षतिग्रस्त हो चुके हैं।
पहले खुद को बचाया अब बचा रहे सामान: बाढ़ का पानी तो उतर गया, दिल से दीवार तक पर छोड़ गया बर्बादी के निशान
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गांव किनारे अमर उजाला की टीम पहुंची तो उसके प्रवेश द्वार के संपर्क मार्ग पर करीब तीन सौ मीटर दूरी तक भरा पानी बाढ़ के प्रकोप की गवाही दे रहा था। मार्ग के दोनों ओर स्थित खेतों में खड़ी धान, उड़द और सरसों की फसल डूबी और नष्ट हो चुकी फसल भी बाढ़ की त्रासदी बयां कर रही थी। कीचड़ और गंदे पानी युक्त सड़कों से होते हुए टीम जब गांव में दाखिल हुई तो पैदल चलना मुश्किल हो गया। अमर उजाला टीम को सरकारी इमदाद वालों की टीम समझ अपनी छत पर भीगे कपड़े, अनाज सुखा रही मंता देवी झट नीचे उतर आई।
दीवार पर बाढ़ के पानी के छूटे निशान को दिखाते हुए यह बताने की कोशिश की कि घरों में करीब पांच फिट तक पानी भर गया था। उसके बाद अपने मकान की दरकी दीवार और टॉयलेट की बैठी सीट को भी दिखाया। हम लोगों के परिचय देने पर मंता बोली कि चार दिन हो गए त्रासदी झेलते लेकिन कोई सरकारी कर्मचारी राहत देना दूर हाल जानने तक नहीं पहुंचा।
गांव निवासी नौसे मंगलवार की रात याद कर सिहर उठते हैं। बोले-उस दिन सब लोग परिवार के साथ खाना खाने के बाद सो रहे थे। अचानक बाढ़ का पानी रात नौ बजे घरों में घुसने लगा। जब तक वह लोग कुछ समझ पाते पानी का बहाव इतना तेज था कि बच्चों व खुद को सुरक्षित निकाल कर ऊंचे स्थान पर ले जाना मुश्किल हो गया। घरेलू सामान बचाते तो खुद को न बचा पाते। लिहाजा आसपास के भी सभी घरों के लोग अपने घर छोड़ किसी तरह गांव में ऊचे स्थान पर स्थित प्राइमरी स्कूल पर पहुंचे। जिनके पास पशु थे उन्होंने पशुओं को भी किसी तरह ऊंचे स्थानों तक पहुंचाया। बुधवार तक किसी ने अपने घर मुड़कर नहीं देखा।
गुरुवार जब लोग अपने घर में पहुंचे तो किसी की दीवार दरकी मिली तो किसी की ढही। घर में पानी भर जाने से अधिकांश परिवारों के घर में रखा अनाज, कपड़ा, फर्नीचर समेत सारा सामान बुरी तर बाढ़ के पानी में भीगा मिला। नौसे की पत्नी भूख से बेहाल छोटे बच्चों को लेकर छत पर चूल्हा बना उनके लिए रोटी बना रही थी। पूछने पर बताया कि बुधवार व गुरुवार पूरे दिन बच्चों को खाना नहीं मिला। घरेलू सभी सामान घर में भीग चुका था। चूल्हा भी भीग कर टूट चुका था। घर में बाढ़ के साथ आई करीब एक फीट मिट्टी दलदल व कीचड़ में बदल चुकी है। लिहाजा बच्चों को छत से नीचे नहीं जाने दे रहे हैं।
कमोबेश यही स्थिति गांव निवासी अफसाना, सादत, सुखदेयी, जाबिर हुसैन, भूरा, राहत, साबिर, चुन्नीलाल, मदन, ओमप्रकाश, लाला सिंह, गेंदन, बाबू, नन्हें, विजय, सोमपाल समेत सौ से अधिक परिवारों की दिखाई दी। इन परिवारों के लोगों में कोई छत पर भीगे अनाज, कपड़े, फर्नीचर व अन्य भीगा सामान सुखाता मिला तो कोई घरों में बाढ़ के पानी के साथ आई गीली मिट्टी को हटाने की कोशिश में जुटा था। सभी ऊपर वाले से दुआ कर रहे थे कि अब फिर बारिश न आए। वरना उन्हें सूखने के लिए डाला गया समान तक समेटना मुश्किल हो जाएगा। पीड़ित परिवारों ने बताया कि दो दिन तक उन्हें भूखे-प्यासे रात गुजारनी पड़ी। कुछ ने बताया कि वह लोग गांव के पीछे बसे हैं लिहाजा अगर कोई कर्मचारी गांव में राहत के लिए आता भी है तो सड़क से ही लौट जाता है। उन असल पीड़ितों तक तो कुछ पहुंचता ही नहीं।