मेरठ में एनसीईआरटी की नकली पुस्तकों के प्रकाशन का भंडाफोड़ होने के पीछे अधिकृत प्रकाशक के अलावा भाजपा की आपसी गुटबाजी अहम है। प्रकाशक के कंधे पर हाथ रखकर भाजपाइयों ने ही इस पूरे मामले की पटकथा लिखी है। जिसके पीछे सीधे तौर पर संगठनात्मक खींचतान के अलावा साल 2022 के विधानसभा चुनाव में कैंट सीट को लेकर सीधे-सीधे राजनीति है।
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किताबें बरामद
- फोटो : अमर उजाला
यह प्रिंटिंग प्रेस भाजपा के महानगर उपाध्यक्ष संजीव गुप्ता की है। इस प्रिंटिंग प्रेस पर उनके भतीजे सचिन गुप्ता भी उनके पार्टनर हैं। हालांकि कुछ साल पहले तक कैंट विधायक सत्यप्रकाश अग्रवाल के पुत्र भी इस प्रिंटिंग प्रेस में साझीदार थे। लेकिन जब नकली किताबों के प्रकाशन को लेकर छापा पड़ा तो उन्होंने लिखित में अपनी हिस्सेदारी हटा ली। हालांकि इस संबंध में सूत्रों का कहना है कि अभी भी कैंट विधायक के पुत्र की अप्रत्यक्ष साझेदारी इस प्रिंटिंग प्रेस में है।
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फर्जी किताबों का गोदाम
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नहीं दिया किसी को संरक्षण
इस पूरे मामले में कैंट विधायक सत्यप्रकाश अग्रवाल का कहना है कि मेरा या मेरे परिवार के किसी सदस्य का न तो इस तरह के किसी काम से जुड़ाव है और न कभी रहा है। और ना ही मैंने कभी किसी गलत काम करने वाले को संरक्षण दिया है। यदि कोई ऐसी बातें फैला रहा है तो वह राजनैतिक विद्वेष है।
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मौके पर पहुंची पुलिस
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पूरे मामले में भाजपाई ही सक्रिय
प्रिंटिंग प्रेस के मालिक संजीव गुप्ता कैंट विधायक सत्यप्रकाश अग्रवाल के अति निकटतम लोगों में है। इस समय वह भाजपा के महानगर उपाध्यक्ष हैं तो सत्यप्रकाश अग्रवाल के राजनैतिक वारिस होने का भी दावा ठोक रहे हैं। चर्चा है कि भाजपा के ही एक गुट ने एक तीर से दो निशाने साधे हैं। एक तरफ जहां विधायक को सीधे झटका देने की रणनीति है तो संजीव अग्रवाल को पूरी तरह किनारे करने की सोच इस मामले में सामने आ रही है।
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जांच करती टीम
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इस पूरे मामले में भाजपा के एक पदाधिकारी जो कैंट सीट से दावेदार हैं उनकी और एक विधायक की भूमिका को लेकर पार्टी में चर्चा तेज है। इन दोनों ने मिलकर पूरे मामले की पटकथा लिखी है। क्योंकि पदाधिकारी के खास लोग हुक्काबार में संलिप्त हैं तो एमसीएक्स के कारोबार से भी जुड़े हैं। जिसे लेकर कैंट विधायक गुट काफी समय से विरोध दर्ज करा रहा था।