कहावत है कि इंसान की हर बड़ी सफलता के पीछे किसी न किसी का हाथ जरूर होता है। वर्ल्डकप में अंडर-19 टीम इंडिया की कप्तानी की कमान मिलने वाले प्रियम गर्ग की कहानी भी कुछ ऐसी ही है।
मां की मौत के बाद भी पिता ने नहीं टूटने दिया बेटे का हौसला, साईकिल पर घर-घर दूध बेचकर बनाया क्रिकेटर
मूल रूप से मेरठ के किला परीक्षितगढ़ निवासी, प्रियम गर्ग महज आठ साल की उम्र से ही क्रिकेट खेलने लगे। पिता नरेश गर्ग ने बताया गांव के स्कूली मैदान में वो दोस्तों के साथ क्रिकेट खेलने जाता था।
कुछ लोगों ने उन्हें बताया कि प्रियम बल्लेबाजी बहुत अच्छी करता है, उसकी प्रतिभा निखरे इसके लिये वह मेरठ में उसको क्रिकेट एकेडमी ज्वाइन कराएं। लेकिन प्रियम के पिता नेरश गर्ग साईकिल से घर-घर जाकर दूध बेचकर आजीविका चलाते थे। उनके लिए यह मुश्किल था।
नरेश गर्ग ने बताया उनकी आर्थिक स्थिति सामान्य थी, न ही कोई मजबूत सोर्स था। जिससे वह अपने बेटे का एडमिशन मेरठ में करा सकें।
गांव के लोगों ने हौसला बढ़ाया तो कुछ दिनों बाद पिता नरेश ने भामाशाह पार्क में कोच संजय रस्तोगी से मुलाकात की। कोच संजय रस्तोगी ने प्रियम की बल्लेबाजी देखी तो उन्हें उसके अंदर भविष्य का अच्छा क्रिकेटर नजर आया।
मेरठ में एकेडमी ज्वाइन कराने के बाद पिता ने बेटे प्रियम गर्ग को अच्छा क्रिकेटर बनाने के लिये दिन-रात मेहनत की। प्रतिदिन किला परीक्षितगढ़ से मेरठ भेजने और उसको वापस लाने की जिम्मेदारी भी बड़ी थी। क्योंकि 2009 में साधनों की कमी के चलते कई बार साइकिल से भी मेरठ आना पड़ता था।
पिता नरेश गर्ग वर्तमान में स्वास्थ विभाग में गाड़ी चालक हैं, दूध का काम छोड़कर वह गाड़ी चलाकर अपना घर चला रहे हैं। जबकि रणजी मैचों में खिलाड़ी बेटे का सलेक्शन होने के बाद बेटे को अच्छी रकम मिलती है, जिससे घर के हालात अब पहले से बेहतर हो गए हैं।
पढ़-लिख कर बड़ा अधिकारी बन जाएगा
दस साल पहले खेलों को लेकर माता-पिता और परिवार के लोग बेहद नाराज रहते थे। प्रियम गर्ग के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। मां कुसुम देवी भी प्रियम को समझाती थी कि खेल में कुछ नहीं रखा है। पढ़-लिख ले बड़ा अधिकारी बना जाएगा, लेकिन प्रियम के अंदर क्रिकेटर बनने का जुनून सवार था।
2011 में प्रियम की मां कुसुम देवी की बिमारी के कारण मृत्यु हो गई। उस समय प्रियम की उम्र मात्र 11 साल थी। मां की मौत के बाद पिता नरेश गर्ग ने प्रियम का हौसला नहीं टूटने दिया। मां की मौत के दौरान उसने एकेडमी जाना छोड़ दिया था। लेकिन कुछ दिनों बाद पिता ने उसको फिर से एकेडमी भेजना शुरू किया।
इसके बाद यूपी अंडर-14, 16, 19 में उसका चयन होता चला गया। प्रियम का प्रदर्शन दिन प्रतिदिन निखरता गया। एक क्रिकेटर के जीवन में खेल के साथ टीम की कप्तानी भी मिले तो पिता के लिए इससे बड़ा गौरव नहीं हो सकता।