कहते हैं संघर्ष का नाम ही जिंदगी है लेकिन इसे सरकार की नजरअंदाजी ही कहा जाएगा कि देश और प्रदेश स्तर पर तीरंदाजी में ढेरों मेडल जीतने वाली मेरठ की मनीषा गागट आज लड़कों की तरह फावड़ा मजदूरी करने को मजबूर हैं।
हुनर से देश को दिलाए मेडल, अब फावड़ा चलाने को मजबूर हुए हाथ, भावुक कर देगी तीरंदाज बेटी की ये कहानी
मेरठ में रोहटा रोड फाजलपुर गांव निवासी मनीषा गागट प्रदेश स्तरीय प्रतियोगिताओं में कई मेडल भी जीत चुकी हैं लेकिन अब खराब आर्थिंक हालातों ने उन्हें मजदूरी करने पर मजबूर कर दिया है। आज वह लड़कों की तरह फावड़ा चलाती हैं, सीमेंट से भरे भारी तसले उठाती हैं। यही नहीं हालात यह हैं कि अब उनके तीरंदाजी को छोड़ने की नौबत तक आ गई है।
प्रदेश स्तरीय प्रतियोगिताओं में मनीषा ने खूब पदक जीते लेकिन अपने लिए धनुष बाण खरीदने के लिए पैसे नहीं हैं। पिता चौकीदार की नौकरी करते थे जो लाॅकडाउन के कारण छूट गई और परिवार पर खाने के भी लाले पड़ गए। अब वह अपने पिता के साथ मजदूरी करने जाती हैं और जमकर मेहनत मजदूरी करती हैं।
बता दें कि तीन भाई.बहनों में सबसे छोटी मनीषा 2015 से तीरंदाजी में शानदार प्रदर्शन कर रही हैं। वो राज्य स्तर पर एक स्वर्णए चार रजतए चार कांस्य पदक जीत चुकी हैं।
ऑल इंडिया यूनिवर्सिटी खेलो इंडिया में कांस्य पदक, जूनियर व सीनियर नेशनल और यूथ खेलो इंडिया में भी प्रतिभाग कर चुकी हैं। मनीषा ने कैलाश प्रकाश स्टेडियम की कोच रहीं अनुपमा के धनुष से तीरंदाजी सीखना शुरू किया था।
दो साल तीरंदाजी सीखने के बाद वह स्नातक के लिए गुरुनानक देव विवि अमृतसर चली गईं। वहां पढ़ाई के साथ विवि ने धनुष भी मुहैया कराया। स्नातक पूरा होने वाला है। ऐसे में धनुष भी विवि में जमा हो जाएगा। मनीषा अपने खेल से बेहद प्यार करती हैं। उन्हें लग रहा है कि आर्थिक समस्या के कारण उनका खेल छूट जाएगा।
साइकिल से जाती हैं स्टेडियम
रोहटा रोड से करीब आठ किलोमीटर साइकिल चलाकर मनीषा स्टेडियम पहुंचती हैं। इन हालातों में भी वो सुबह और शाम स्टेडियम जाती हैं। वहां साथियों के धनुष से अभ्यास करती हैं। स्टेडियम में भी टारगेट की हालत बेहद खस्ता हो चुकी है।