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बसंतर के शहीदों की याद में भीगीं पलकें, लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल के भाई ने साझा की यादें

Mon, 17 Dec 2018 04:26 PM IST
Dimple Sirohi न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ Published by: Dimple Sirohi Updated Mon, 17 Dec 2018 04:26 PM IST
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Meerut Lieutenant Arun Khetrapal brother shared memories in the rememberence of Basantar martyrs
indian army

मेरठ में 17 पूना हॉर्स रेजीमेंट का मैदान रविवार को अदम्य साहस, शौर्य और शूरवीरों की गाथाओं से गूंज रहा था। कैंट स्थित रेजीमेंट में 1971 में बसंतर के युद्ध के शहीदों की याद में समारोह का आयोजन हुआ। इस दौरान रेजीमेंट स्थित गुरुद्वारे में अरदास व मंदिर में प्रार्थना हुई। इसके बाद मैदान में आयोजित सैनिक सम्मेलन में युद्ध के शहीदों को पुष्प चक्र अर्पित कर सलामी दी गई। 1971 के युद्ध के वेट्रेन (पूर्व सैनिकों) ने युद्ध से जुड़े किस्से सुनाए तो मैदान में बैठे हर व्यक्ति की आंखें नम हो गईं। 17 पूना हॉर्स को मिली निशानियों का भी इस अवसर पर प्रदर्शन किया गया। पंजाब सरकार द्वारा भेंट धरोहर भी दर्शाई गई। युद्ध में आला दर्जे के कौशल के लिए पांच पदक पाने वाले मेजर राम सिंह के पोते सोहन सिंह राठौर ने उनके पदक और पुस्तिका रेजीमेंट को धरोहर के रूप में सौंपी। राम सिंह के परिवार से एलडी स्वर्ण सिंह इस रेजीमेंट में सेवारत हैं।

Meerut Lieutenant Arun Khetrapal brother shared memories in the rememberence of Basantar martyrs
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आयोजन में असम के पूर्व राज्यपाल और 1971 में बसंतर की जंग का हिस्सा रहे लेफ्टिनेंट जनरल अजय सिंह ने बताया कि 17 पूना हॉर्स रेजीमेंट को रिजर्व में डाल दिया गया था। लेकिन हमारे जांबाज दुश्मन को रौंदने के लिए बेताब थे। उनकी यह बेताबी अजय सिंह ने जनरल हनूत सिंह के सामने रखी। उन्होंने आगे बढ़ने का आदेश दे दिया। 15 दिसंबर 1971 की तड़के 17 पूना हॉर्स रेजीमेंट के कमांडेंट को बसंतर में तैनात 47 इंफेंट्री ब्रिगेड, 16 मद्रास और 3 ग्रेनेडियर्स को प्रोटेक्शन मुहैया कराने के आदेश हुए। 

Meerut Lieutenant Arun Khetrapal brother shared memories in the rememberence of Basantar martyrs
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कमांडेंट ने चंद मिनटों में तय कर लिया कि गाजीपुर वन क्षेत्र को सुरक्षित रखने के लिए टैंकों की भीषण जंग होने जा रही है। माइन फील्ड क्रास करते हुए रेजीमेंट के जांबाज बसंतर नदी तक चले गए। रात का समय था और बारिश भी हो रही थी। दुश्मन बीच-बीच में हवाई हमले कर रहा था। विषम हालात में भी रेजीमेंट आगे बढ़ती गई और दोनों तरफ  से टैंकों की भिड़ंत हुई। हमारे शूरवीरों ने जंग फतह की। खुशहाल सिंह भी रविवार को आयोजन स्थल पर मौजूद थे। पूना हॉर्स रेजीमेंट के कर्नल कमांडेंट जनरल आशीष डोगरा ने भी रेजीमेंट की उपलब्धियों के बारे में बताया। उस वक्त अजय सिंह के ड्राइवर रहे सरदार खुशहाल सिंह भी मौजूद रहे। 
आयोजन स्थल पर चारों ओर रेजीमेंट के टैंक खड़े थे। इन टैंकों पर 1971 के युद्ध के वेट्रेन योद्धा बैठकर बसंतर की जंग में सैनिकों की बहादुरी के किस्से सुना रहे थे। युद्ध के किस्से सुनकर रेजीमेंट के हर जवान व अफसर का सीना गर्व से चौड़ा हो गया।  देश के सबसे कम उम्र के परमवीर चक्र लेने वाले शहीद सेकेंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल के भाई ने कार्यक्रम में पहुंचकर अरुण की बहादुरी के किस्से सुनाए। 

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अरुण खेत्रपाल के भाई ने साझा की यादें
पूना होर्स रेजीमेंट के सेंकेंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल के छोटे भाई मुकेश खेत्रपाल भी समारोह में आए। मुकेश ने बताया कि अरुण बसंतर के मोर्चे पर थे। घर में छोटी मोटी सूचनाएं बस रेडियो से मिलती थीं। युद्ध के बाद 18 दिसंबर को घर पर टेलीग्राम आया कि अरुण खेत्रपाल शहीद हो गए। यह पढ़ते ही मां बेहोश हो गई। वह मुझसे एक साल बड़े थे। मुकेश ने कहा कि सेकेंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल ने बसंतर में मोर्चा संभाला। इस दौरान उन्होंने दुश्मन के कई टैंक बर्बाद किए। उनके टैंक पर आग लग जाने की वजह से कमांडर ने अरुण खेत्रपाल को टैंक छोड़ने का आदेश दिया, लेकिन उन्होंने ऐसा करने से मना कर दिया। रेडियो पर अरुण के आखिरी शब्द थे, सर मेरी गन अभी फायर कर रही है। जब तक ये काम करती रहेगी, मैं फायर करता रहूंगा। अरुण 1967 में एनडीए में शामिल हुए थे। 

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हैदराबाद के निजाम नहीं चाहते थे विलय
1971 की जंग में शामिल रहे रिसलदार मेजर गुलाब सिंह ने कहा कि 17 पूना हॉर्स रेजीमेंट को दुनिया के 13 देशों में सहायता युद्ध लड़ने का गौरव है। हैदराबाद के भारत में विलय में भी पूना हॉर्स ने अहम भूमिका निभाई थी। हैदराबाद के निजाम हैदराबाद का भारत में विलय नहीं करना चाहते थे। पूना हॉर्स ने भारत-पाकिस्तान के बीच हुई 1965 और 1971 की लड़ाई में भी अहम भूमिका निभाई। साल 2006-2008 में संयुक्त राष्ट्र शांति सेना के अभियान के तहत गोलन हाइट्स इलाके में भी तैनात रही।

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