पौराणिक निधियों का पर्याय है परीक्षितगढ़। यहां टहलते हुए आप सरलता से महाभारत काल की पदचाप सुन सकते हैं। उसके पीछे-पीछे कदम खुद चल पड़ते हैं और सामने होते हैं उस युग के पात्र। यहां के मंदिर, ताल, कूप उन चरित्रों को कल्पना से निकालकर यथार्थ में ले आते हैं। कुछ ही क्षणों में आप युगों की यात्रा कर लेते हैं। ये सिर्फ ईंट-पत्थर से चिने भवन नहीं बल्कि कालखंड के वे चिन्ह हैं जिन्हें अमिट रखने का दायित्व हम सबका है। इस कड़ी में आपको धर्म की इन अतुलनीय धरोहरों से मिलवाते हैं।
परीक्षितगढ़: युगों की यात्रा के साथ यहां जीवंत हो उठते हैं महाभारत के पात्र, सुनाई देती है पदचाप
गुफा गोपेश्वर मंदिर में प्राचीन शिवलिंग स्थापित है। कहा जाता है कि परशुराम ने इनकी स्थापना की थी। श्रीकृष्ण ने गुफा गोपेश्वर का पूजन किया है। यहां एक गुफा थी जो गांधारी तालाब तक जाती थी।
‘मेरठ के पांच हजार वर्ष’ पुस्तक (संपादक विघ्नेश कुमार) के अनुसार गुफा गोपेश्वर के विषय में एक मान्यता प्रचलित है।
जब श्रीकृष्ण कौरवों और पांडवों के मध्य संधि करवाने के उद्देश्य से हस्तिनापुर जा रहे थे तो मार्ग में उन्होंने यहीं पर विश्राम किया था। इसके निकट एक तालाब है जो नष्ट हो चुका है। ‘इतिहास पुण्य पुरातन किला परीक्षितगढ’ पुस्तक में लिखा है कि श्रीकृष्ण इस स्थान पर ठहरे थे। इसके महत्व के कारण युधिष्ठिर ने यहां गोपेश्वर मंदिर और श्यामा तालाब का निर्माण कराया।
अब आते हैं गांधारी सरोवर पर जिसका अस्तित्व रामायण काल से भी पूर्व का बताया जाता है। महाभारत काल में जो कौरवों की माता गांधारी व महर्षि व्यास से जुड़ा। वर्तमान में इससे पानी निकाला गया है। नगर पंचायत द्वारा इसके सौंदर्यीकरण की योजना बनाई गई है। यहां कदंब के दो पुराने वृक्ष हैं। मंदिर के बाहर दो अनगढ़ नंदी स्थापित हैं। जनश्रुति है कि ये दोनों अपना स्थान बदलते रहते हैं।
गांधारी तालाब
अंदर गड्ढों से युक्त प्राचीन शिवलिंग है। उसका पत्थर घिस चुका है। जो इसकी प्राचीनता को प्रमाणित करता है। मंदिर के पार्श्व में दक्षिणामुखी हनुमान जी की विलक्षण प्रतिमा वाला मंदिर है। हनुमान जी की प्रतिमा चमत्कारिक है। अंगूठे से दबाने पर इसमें गड्ढा पड़ जाता है। जो बाद में स्वयं भर जाता है।