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महाभारत सर्किट: भरी सभा में द्रौपदी के चीर हरण और महादानी कर्ण की दानवीरता का साक्षी है हस्तिनापुर

Wed, 26 Feb 2020 12:53 PM IST
Dimple Sirohi रैना पालीवाल, अमर उजाला, मेरठ
रैना पालीवाल, अमर उजाला, मेरठ Published by: Dimple Sirohi Updated Wed, 26 Feb 2020 12:53 PM IST
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Mahabharata Circuit: Hastinapur is witness to Draupadi cheerharan and Karna charity
hastinapur temple - फोटो : अमर उजाला

मैं मयराष्ट्र का सिरमौर पर उजाड़ हस्तिनापुर हूं, जिसने बसने और उजड़ने के अनेक दौर देखे हैं। मेरे भाल पर वैभव से पराभव तक की कथा लिखी है। मैं कुरु जनपद की राजधानी, दुष्यंत की धरा, कौरवों और पांडवों के मतभेदों की कहानी हूं। भरी सभा में द्रौपदी के चीर हरण और कृष्ण द्वारा उनकी अस्मिता की रक्षा का मैं साक्षी हूं। महाभारत युद्ध के अंकुर मेरी धरती पर प्रस्फुटित हुए थे।

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कौरवों के षड़यंत्र और पांडवों के संघर्षों की गाथा गाता गजपुर, हस्तिनपुर, नागपुर मैं ही तो हूं।  मेरी गोद में त्रिभुवन का वैभव खेलता था। मुझे स्वर्ग की उपमा दी जाती थी। गौरवशाली अतीत को खुद में समेटे खड़ा नीरव वर्तमान है। इस निःस्तब्धता ने मुझे निस्तेज कर दिया है। मेरे स्वर्णिम काल के अवशेष अब भी भूगर्भ में दबे पड़े हैं। भग्नावशेषों में शेष हूं। जो बचा है वो परित्यक्त है। उसी को अभिव्यक्त करने की एक पहल है।

Mahabharata Circuit: Hastinapur is witness to Draupadi cheerharan and Karna charity
hastinapur temple - फोटो : अमर उजाला
पांडवों की स्मृतियों को अक्षुण्ण रखे हुए हैं पांडुरेश्वर या पांडवेश्वर मंदिर। मंदिर प्रांगण में बरगद और पीपल के प्राचीन वृक्ष हैं। गर्भगृह में शिवलिंग के अलावा एक प्रस्तर खंड में पांडवों की आकृतियां हैं। जो घिस चुकी हैं। यहां पांडव कूप भी है।

मंदिर में इसके निर्माण का उल्लेख है। गुर्जर राजा नैन सिंह ने सन् 1798 में मंदिर का निर्माण कराया था। मंदिर के सेवक गरीब गिरि कहते हैं, यह स्थान प्राचीन है। राजा ने मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था। जनश्रुति है कि यह कौरव और पांडवों की क्रीड़ा स्थली भी है। इन वृक्षों के नीचे वे क्रीड़ा करते थे।
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hastinapur temple - फोटो : अमर उजाला
जहां सोना दान करते थे कर्ण
हस्तिनापुर का एक मार्ग कर्ण घाट जाता है। घाट से गंगा दूर हो गई है लेकिन यह स्थान दानवीर की गाथा गा रहा है। बाईं ओर कामाख्या माता का छोटा सा मंदिर है जो जमींदोज हो चुका है। कहते हैं, इसी में उनकी मूर्ति दबी हुई है। कर्ण यहां गुप्त रूप से माता को प्रसन्न करने के लिए अपने शरीर की आहुति देते थे। 
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hastinapur temple - फोटो : अमर उजाला
इसके निकट कर्ण मंदिर वह स्थान है जहां बैठकर कर्ण सवा मन सोना दान किया करते थे। जनश्रुति है कि यहीं पर कर्ण ने इंद्र को कवच और कुंडल दान किए थे। आठ साल पहले मंदिर में शिवलिंग और कामाख्या देवी की मूर्ति स्थापित हुई है।

केके शर्मा ने अपनी पुस्तक ‘मेरठ जनपद के पर्यटन स्थल’ में लिखा है कि मंदिर के स्थापत्य से यह मराठा कालीन प्रतीत होता है। करीब पांच साल पहले तक मंदिर के गुंबद पर सोना चढ़ा हुआ था। कुछ दबंग लोगों ने उसका बंदरबांट कर लिया। कर्ण मंदिर अतिक्रमण का शिकार है। 
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hastinapur temple - फोटो : अमर उजाला
यहां के महंत शंकर देव कहते हैं, लगभग 20 साल पहले यहां से गंगा दूर हो गईं। कामाख्या देवी का प्राचीन मंदिर जो नष्ट हो गया, को नूपुर पीठ कहा जाता है। मंदिर से जुड़ी बीस बीघा जमीन पर भूमाफियाओं का कब्जा हो गया। जिस जगह पर आप बैठे हो, वह भी उन्हीं के नाम चढ़ी है। सरकार ने इस स्थान को उपेक्षित छोड़ रखा है। यहां देश-विदेश से श्रद्धालु आते हैं। 

 
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