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अपने आंगन में पराई सोन चिरैया, बेटों के जन्म पर जश्न, लाडो से मिलने तक नहीं आते बाबा और मैया

Wed, 11 Dec 2019 05:47 PM IST
Dimple Sirohi रैना पालीवाल, अमर उजाला, मेरठ
रैना पालीवाल, अमर उजाला, मेरठ Published by: Dimple Sirohi Updated Wed, 11 Dec 2019 05:47 PM IST
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Lado, kanya gurukul in Meerut is making girls educated and empowered
lado - फोटो : अमर उजाला

लाडो जब घर में आती है न जाने क्यों मायूसी छा जाती है। बेटों के जन्म पर पुजते हैं कुएं, बेटी के आने की घड़ी कोसी जाती है। सोहर के स्वर सिर्फ लाल के लिए हैं। लाडली के लिए न तो मंगल गीत हैं और न उत्सव। जिस आंगन में सोन चिरैया सी चहकती, फुदकती हैं, वही उन्हें नहीं अपनाता। वे हर जगह पराई हैं। उनका कोई ठौर नहीं है। जहां जाती हैं, प्यार लुटाती हैं पर खुद स्नेह और अपनत्व से वंचित रहती हैं। 

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Lado, kanya gurukul in Meerut is making girls educated and empowered
शिक्षा और संस्कार हर गुण से निपुण है यहां की छात्राएं - फोटो : अमर उजाला
आज भी समाज के बड़े तबके का बेटियों के प्रति नजरिया ऐसा ही है। उनके लिए लाडो बोझ है। तभी तो वे भगवान से कहती हैं, अगले जनम मोहे बिटिया ना कीजो। मेरठ से सटे परीक्षितगढ़ के नारंगपुर गांव में स्थित कन्या गुरुकुल में 70 लड़कियां पढ़ती हैं। ये गाजियाबाद, हरियाणा, मुजफ्फरनगर, मेरठ, मुरादाबाद, उड़ीसा आदि  स्थानों से यहां आई हैं। इनमें करीब 25 प्रतिशत बच्चियां ऐसी हैं जिनके घरवाले उन्हें यहां छोड़कर चले गए। फीस से बचने के लिए वे उनसे मिलने तक नहीं आते... 
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गुरूकुल में छात्राएं खेल में बढ़ चढ़कर लेती हैं हिस्सा - फोटो : अमर उजाला
नारंगपुर के श्रीमद् दयानंद उत्कर्ष आर्ष कन्या गुरुकुल में ऐसी कई बेटियां हैं जिनके मां-बाप ने उन्हें यहां छोड़कर किनारा कर लिया। अपनों से दूर नन्हीं कलियां मुरझा रही हैं लेकिन उन्हें तरस नहीं आता। गुरुकुल की संचालक रश्मि इन बेटियों को गले नहीं लगातीं तो वे कहां जातीं। 
Lado, kanya gurukul in Meerut is making girls educated and empowered
शिक्षा और संस्कार हर गुण से निपुण है यहां की छात्राएं - फोटो : अमर उजाला
गुरुकुल की प्रबंध निदेशक रश्मि आर्य नहीं चाहतीं कि ऐसी बेटियों का नाम सार्वजनिक हो। वह बताती हैं, ऐसे कई केस हैं। जब तक लड़की यहां रहेगी, माता-पिता मिलने नहीं आएंगे। जब वह पढ़-लिख जाती है, तब उसे ले जाते हैं। कुछ बेटियां पढ़कर चली गईं। कुछ अभी भी पढ़ रही हैं। 
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शिक्षा और संस्कार हर गुण से निपुण है यहां की छात्राएं - फोटो : अमर उजाला
जो लोग फीस देने में समर्थ हैं, उनसे साल भर के भोजन शुल्क के रूप में 15 हजार रुपये लिए जाते हैं। बाकी सारा खर्च हम वहन करते हैं। मध्यम वर्गीय परिवार उसे भी देने से बचते हैं और दूरी बना लेते हैं। उनके न आने का असर बेटियों पर पड़ता है।

वे डिप्रेशन में आ जाती हैं। दूसरी बच्चियों के माता-पिता उनसे मिलने आते हैं तो उन्हें बहुत खराब लगता है। उनके घर से कोई नहीं आता। कुछ बच्चियां बीमारी का बहाना बनाती हैं। डॉक्टर के पास ले जाते हैं तो सच सामने आता है। 
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