कारगिल युद्ध की जब भी बात होती है तो मेरठ के पांच सपूतों के बलिदान की कहानियां हर देशवासी के सीने को गर्व से चौड़ा कर देती हैं। जिले के पांच वीर सपूतों की कारगिल युद्ध के दौरान दिखाई बहादुरी और जांबांजी के किस्से उनके देश के प्रति सच्ची श्रद्धा और बलिदान को बयां करती हैं। हर साल 26 जुलाई को कारगिल विजय दिवस पर मातृभूमि की रक्षा करते हुए शहीद हुए इन जांबाजों को नमन किया जाता है।
Kargil Vijay Diwas: मेरठ के पांच बेटों ने कारगिल में जान की बाजी लगाकर चुकाया वतन की मिट्टी का कर्ज
जब योगेंद्र शहीद हुए थे, उनकी बेटी आठ साल की थी
कारगिल युद्ध में टाइगर हिल पर पाकिस्तानी सेना ने सबसे ज्यादा नुकसान किया। दुश्मन 18 हजार फीट की ऊंचाई पर और हमारे जवान नीचे। वे पत्थर भी फेंकते तो गोली की तरह लगता। उधर से मशीनगन चल रही थी। कितने ही अफसर-जवान शहीद हो गए थे। योगेंद्र यादव की बटालियन को टास्क दिया गया। ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव ने अपने सात साथियों के साथ प्वाइंट पर पहुंचकर पाकिस्तानी बंकरों को ध्वस्त किया।
उन्होंने दुश्मन के 17 जवानों को मौत के घाट उतार दिया। पांच जुलाई 1999 की शाम को दुश्मन की जवाबी गोलीबारी में वो शहीद हो गए। उनकी वीरता के लिए वीर चक्र मेडल दिया गया। उनकी पत्नी वीर नारी उर्मिला देवी बताती हैं, उनकी शहादत के समय बड़ी बेटी ज्योति महज आठ साल की थी। बेटा संदीप सात और दीपक चार साल का था। बेटे संदीप और दीपक बताते हैं कि पिता की बहादुरी पर उन्हें फख्र होता है।
तिरंगा फहराकर शहीद हुए मेजर मनोज तलवार
मवाना रोड स्थित डिफेंस कालोनी ए-34 निवासी मेजर मनोज तलवार की फरवरी 1999 में फिरोजपुर पंजाब में तैनाती हुई। लेकिन वे देश के लिए कुछ करना चाहते थे, उन्होंने सियाचिन में नियुक्ति की मांग कर दी। कारगिल में युद्ध हुआ तो उनकी बटालियन को टुरटुक में भेजा गया।
13 जून को उन्होंने कारगिल सेक्टर टुरटुक में तिरंगा फहरा दिया। इसी बीच दुश्मन की तोप के गोले के वार से वह शहीद हो गए। उनके पिता रिटायर्ड कैप्टन पीएस तलवार का कुछ दिन पहले ही निधन हो चुका है। मां ऊषा तलवार का निधन कई वर्ष पहले हो गया था। परिवार में छोटे भाई और बहनें हैं।
फतह के बाद शहीद हुए सत्यपाल सिंह
मूलरूप से गढ़मुक्तेश्वर के लुहारी गांव निवासी लांसनायक सत्यपाल सिंह का जनवरी 1999 में जम्मू तबादला हुआ था। इसी बीच कारगिल की जंग शुरू हो गई। उनकी बटालियन सेकेंड राजपूताना राइफल्स को कारगिल पहुंचने का आदेश मिला।
तोलोलिंग जीतने के बाद 28 जून को दुश्मनों से लड़ते हुए वो द्रास सेक्टर में शहीद हो गए। बड़ा बेटा पुलकित साढ़े तीन साल और बेटी दिव्या ढाई साल की थी।
जुबैर ने ली थी दुश्मनों से टक्कर
मूलरूप से ललियाना एवं वर्तमान में जैदी फार्म निवासी वीर नारी इमराना बताती हैं कि जुबैर अहमद की 22 ग्रेनेडियर हैदराबाद से जम्मू में तैनाती हुई थी। इसी बीच लड़ाई शुरू हो गई। वह पत्नी इमराना और परिवार को दिलासा देकर चले गए।
तीन जुलाई 1999 को हिंद पहाड़ी पर लड़ते-लड़ते वह शहीद हो गए। आज उनकी बड़ी बेटी सना परवीन पोस्ट ग्रेजुएशन कर चुकी हैं। छोटी बेटी निशा परवीन ग्रेजुएट हैं। बेटा खालिद जुबैर अपना काम कर रहा है।