एशियन गेम्स में बेटियों की कामयाबी से मेरठ के लोग गौरवान्वित हैं। पारुल चौधरी ने जहां पांच हजार मीटर दौड़ में स्वर्ण पर कब्जा किया तो अन्नू रानी का भाला सोने पर जाकर टिका। चीन से लेकर अन्नु के गांव बहादरपुर में जश्न का माहौल है।
एशियाड की महिलाओं की भाला-फेंक स्पर्धा में स्वर्ण जीतने वाली अन्नु रानी के लिए एक वक्त ऐसा भी था जब उनके पिता उन्हें डेढ़ लाख रुपये का भाला दिलाने में असमर्थ थे। अन्नु को पहला भाला 2500 रुपये में दिलाया गया था। इसके बाद अन्नु ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और एक के बाद एक कामयाबी हासिल की। गांव की पगडंडियों से शुरू हुआ उनका सफर स्वर्णिम रहा है।
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अन्नू के पिता
- फोटो : Amar Ujala
मेरठ से सटे सरधना के बहादरपुर गांव की बेटी अन्नु रानी के जज्बे को बुखार भी नहीं डिगा पाया। प्रतियोगिता से 15 दिन पहले उन्हें तेज बुखार था। शरीर काफी कमजोर हो गया था। एक बार लगा था कि शायद अन्नु इस बार प्रतियोगिता में हिस्सा नहीं ले पाएगी, लेकिन परिजनों ने उसका हौसला बढ़ाया।
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अन्नू रानी
- फोटो : Amar Ujala
बुखार तो उतर गया, लेकिन शरीर में पहले जैसे ताकत नहीं रही। परिवार के साथ और आत्मविश्वास के बल पर अन्नु ने खुद को तैयार किया और देश के लिए गोल्ड मेडल जीता। अन्नु रानी की माता मुन्नी देवी व पिता अमरपाल सिंह ने बताया कि जर्मनी में लगातार तैयारी की। ईश्वर ने उसकी मेहनत का फल दे दिया।
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अन्नू रानी का परिवार
- फोटो : Amar Ujala
वीडियो कॉल से सबसे पहले भाई को दी जानकारी
अन्नु रानी ने गोल्ड मेडल जीतने के बाद सबसे पहले अपने भाई उपेंद्र सिंह को वीडियो कॉल कर जानकारी दी। उपेंद्र सिंह ने बताया कि अन्नु बचपन में क्रिकेट खेला करती थी। फिर उसने खेतों में गन्ने फेंकने शुरू किए। 12 साल के कॅरिअर में असुविधाओं से लड़ते हुए अन्नु यहां तक पहंुची है।
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अन्नू रानी का परिवार
- फोटो : Amar Ujala
पिता अमरपाल सिंह ने बताया कि उनका भतीजा लाल बहादुर व बेटा उपेंद्र अच्छे धावक रहे हैं। भाइयों से प्रेरणा लेकर अन्नु रानी ने खेल के मैदान में कदम रखा। अन्नु जब नौवीं कक्षा में थी तब से ही अपने खेत में अभ्यास करती थी।