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होली के रंग कवियों के संग: काव्य कैफे में सजी ऐसी महफिल, खिल उठे चेहरे, देखें तस्वीरें

Fri, 28 Feb 2020 02:45 PM IST
कपिल kapil न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ Published by: कपिल kapil Updated Fri, 28 Feb 2020 02:45 PM IST
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Amar Ujala kavya Cafe program in Meerut city of Uttar Pradesh
कार्यक्रम के दौरान खिल उठे चेहरे - फोटो : अमर उजाला

मेरठ में अमर उजाला और सुभारती प्रजेंट्स काव्य कैफे का आयोजन किया गया। इस दौरान कवियों के संग होली के रंग ऐसे बहे कि हर कोई डूबता चला गया। काव्य कैफे में गीत और गजलों की ऐसी महफिल सजी की शाम रंगीन हो गई। कवियों ने शृंगार रस में डूबी कविताओं से समां बांध दिया।

Amar Ujala kavya Cafe program in Meerut city of Uttar Pradesh
काव्य कैफे कार्यक्रम - फोटो : अमर उजाला

वहीं डॉ. विष्णु ने श्रोताओं की फरमाइश पर अपनी सबसे उम्दा कविता ‘रेत पर नाम लिखने से क्या फायदा, एक आई लहर कुछ बचेगा नहीं’ भी सुनाई।

Amar Ujala kavya Cafe program in Meerut city of Uttar Pradesh
कार्यक्रम में हंसती महिला - फोटो : अमर उजाला

इसके बाद सर्वेश अस्थाना ने दहेज पर व्यंग्य किया कि भाई-बहनों ये जो मैं आपको हंसता-मुस्कराता इस्माईलमैन दिख रहा हूं, असलियत ये है कि मैं एक दहेज लोभी बाप का बेटा हूं, और हर साल किराए पर बिक रहा हूं... सुनाकर वाहवाही बटोरी। उन्होंने भ्रष्टाचार और नेता के किरदार पर व्यंग्य किया। पढ़ा कि किसी गिरगिट की नेता से तुलना करना पाप है, क्योंकि रंग बदलने के मामले में नेता गिरगिट का बाप है।

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काव्य कैफे कार्यक्रम - फोटो : अमर उजाला

युवा कवि राजीव उर्फ साहिर ने अपनी शायरी से सभी का दिल जीत लिया। पढ़ा, मेरे ख्वाबों में यूं न आया कर, मेरी जां मत मुझे सताया कर, रोशनी तेरी कम नहीं होगी, मेरी आंखों को चूम जाया कर। दिल्ली के मौजूदा हालात पर उन्होंने पढ़ा, ‘दिल्ली की सूरत विधवा औरत सी है, कबके मर गए मांग सजाने वाले लोग। साहिर ऐसे दोस्त बहुत कम होते हैं, गोद में सर रखकर सहलाने वाले लोग’।

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अपने पति के साथ मेयर सुनीता वर्मा - फोटो : अमर उजाला

युवा कवि प्रदीप राठौर ने पढ़ा, ‘किस्से से गुजरे तो किरदार बने, सबकुछ बनकर देख लिया फिर यार बने। है ये सितम मैं रोया तो तनगीब मिली, जब वो रोई तो नज्म हुई अशआर बने’। कवि शुभम ने अपने परिचय में कहा, नाम है पांडे झुक कर सलाम करता हूं, शौक से कविता पेशे से आईआईटी में काम करता हूं। उन्होंने सुनाया कि ‘इश्क में खर्चे होते हैं कोई दाम नहीं आता, इश्क की वैकेंसी में पैसा काम नहीं आता’। युवा कवि सूरजमणि ने पढ़ा, ‘यह भी सच है तुम मेरी मोहब्बत में मेरी चाहत हो मेरी तपस्या हो। प्यार से बात मानती ही नहीं, तुम भी कश्मीर की समस्या हो’।

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