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महाभारत सर्किट: हस्तिनापुर का सैन्य द्वार, जहां आज भी निकलते हैं पुरावशेष

Fri, 28 Feb 2020 11:44 AM IST
कपिल kapil रैना पालीवाल, अमर उजाला, मेरठ
रैना पालीवाल, अमर उजाला, मेरठ Published by: कपिल kapil Updated Fri, 28 Feb 2020 11:44 AM IST
सार

इतिहास के पन्नों का स्वर्णाक्षर हस्तिनापुर का सैन्य द्वार का सिसकता हुआ वर्तमान है।

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Mahabharata Circuit, Antiquities still exist in the military gate of Hastinapur
हस्तिनापुर - फोटो : अमर उजाला

इतिहास के पन्नों का स्वर्णाक्षर हस्तिनापुर का सैन्य द्वार का सिसकता हुआ वर्तमान है। सैनी अपने गौरवशाली अतीत को सहेज न सका। इतिहासकारों ने इस गांव को प्रागैतिहासिक माना है लेकिन गांव अपने समृद्ध अतीत से अनभिज्ञ है...

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Mahabharata Circuit, Antiquities still exist in the military gate of Hastinapur
हस्तिनापुर - फोटो : अमर उजाला
टीले को खोदने पर आज भी पुरावशेष निकलते हैं। इसी टीले पर मराठों के पहरे की मीनार गरुड़ध्वज है, जिसे ग्रामीण गड़गज कहते हैं। इतिहासकार विघ्नेश त्यागी की मानें तो सैनी ही वह स्थान है जहां पांडु की मृत्यु हुई थी। माद्री यहीं सती हुई थीं। पुरा व पौराणिक संपदा के आगार सैनी की सूरत इससे बेहतर हो सकती थी। जो देखा, वह निराश करने वाला है।
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Mahabharata Circuit, Antiquities still exist in the military gate of Hastinapur
प्राचीन पांडेश्वर मंदिर। फोटो : संजू - फोटो : अमर उजाला
मेरठ-मवाना मार्ग पर सैनी एक साधारण गांव है। टीले पर गड़गज है जिसका सरकार द्वारा तीन साल पहले जीर्णोद्धार कराया गया। उसके चारों ओर बाउंड्री व गेट लगाया गया। इस कायाकल्प के बावजूद इस स्थल की दशा नहीं बदली। समूचा परिसर गोबर के ऊपलों से अटा है।
Mahabharata Circuit, Antiquities still exist in the military gate of Hastinapur
प्राचीन पांडेश्वर मंदिर। फोटो : संजू - फोटो : अमर उजाला
ऊपर भी गोबर का अंबार है। टीले को संरक्षित स्थल घोषित किया जा सकता था जो नहीं हुआ। गांव में किसी को गड़गज के इतिहास का नहीं पता। हरेंद्र शर्मा इसके बीच में सुरंग बताते हैं। सेंसर पाल चौधरी कहते हैं, सैनी किसी रियासत की चौकी थी। रियासत वाले की सेना यहां रहती थी। खेड़े को खोदते हैं तो मिट्टी के पात्र मिलते हैं।
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हस्तिनापुर - फोटो : अमर उजाला
इतिहास के गवाक्ष से

'मेरठ के पांच हजार वर्ष' पुस्तक में लिखा है कि ऊंचे टीले पर बसा यह ग्राम निश्चित ही प्रागैतिहासिक है। लेखक (विघ्नेश कुमार) ने इस गांव के टीले से भी प्रागैतिहासिक सभ्यता की खोज की है। अनुश्रति के अनुसार यह गांव भी महाभारत के समय का है। इसे हस्तिनापुर का प्रथम सैन्य द्वार माना जाता है। 'मयराष्ट्र मानस' पुस्तक के अनुसार सैनी टीले पर बसा कहते हैं। यह कौरवों का संकधावार (छावनी) था। यहां एक ऊंची मीनार है जिसे गड़गज (गरुड़ध्वज) कहते हैं। इसे मराठों ने भी अपनी छावनी बनाया था। गरुड़ध्वज उनके पहरे की मीनार थी।
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