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पुलवामा हमले की सच्चाई, आखिर कैसे और क्या हुआ था उस दिन...सैनिक कश्मीर सिंह ने एक-एक बात बताई

Sun, 24 Feb 2019 07:27 PM IST
प्रशांत कुमार यूपी डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
यूपी डेस्क, अमर उजाला, कानपुर Published by: प्रशांत कुमार Updated Sun, 24 Feb 2019 07:27 PM IST
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Soldier told about Paulwama terror attack
डेमो पिक
14 फरवरी की सुबह करीब 3:30 बजे जम्मू से फौजियों का जत्था निकला था। 78 गाड़ियों में सीआरपीएफ, एसएसबी व आईटीबीपी की भी कुछ गाड़ियां शामिल थीं। स्लाइडिंग हो रही थी। करीब 350 किमी का लंबा सफर था, बूंदाबांदी हो रही थी। मेरी बस से करीब 500 मीटर आगे अचानक ऐसा लगा कि जैसे आकाशीय बिजली गिरी हो। धमाके से बहुत तेज रोशनी हुई, जिससे सभी चकाचौंध में आ गए।
Soldier told about Paulwama terror attack
डेमो पिक
विस्फोट इतना तेज था कि कोई कुछ समझ ही नहीं पाया। तत्काल आगे वाली गाड़ी आगे और पीछे वाली गाड़ियां रोक दी गईं। पलक झपकते ही सब कुछ तबाह हो चुका था। हमारे साथियों के चीथड़े उड़ चुके थे। उस दर्दनाक भयानक मंजर को देखकर एकबारगी रूह कांप उठी, और फिर बस आंखों में आक्रोश की नदियां बह उठीं। एक ओर जहां अपनों को खो देने का दर्द था, तो दूसरी ओर देश की सुरक्षा का सवाल था। सब कुछ संभालते हुए सामने खड़ी थी अनुशासन की दीवार।
Soldier told about Paulwama terror attack
डेमो पिक
यह कहानी श्रीनगर से ‘अमर उजाला’ के साथ फोन पर बयां की सीआरपीएफ जवान कश्मीर सिंह ने, जो स्वयं पुलवामा हमले के दौरान सैनिकों के उसी काफिले में मौजूद थे। छिबरामऊ कोतवाली के गांव कमालपुर के रहने वाले जवान सैनिक कश्मीर सिंह ने आपबीती सुनाकर कहा कि किन्हीं कारणों से जहाज की व्यवस्था नहीं हो सकी। फिर 14 फरवरी की सुबह 3:30 बजे सैनिक गाड़ियों से निकले।
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Soldier told about Paulwama terror attack
डेमो पिक
हादसे के बाद सबसे पहले आया पत्नी का फोन
पुलवामा में हमला होने के बाद सबसे पहले उसकी पत्नी प्रियंका का फोन आया। वह काफी डरी और सहमी हुई थी। कश्मीर सिंह ने बताया कि मुझसे बात करने के बाद भी वह पूरी तरह संतुष्ट नहीं थी। यही हाल हमारे अन्य परिजनों का था।
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Soldier told about Paulwama terror attack
डेमो पिक
जड़ से समाप्त हो समस्या
सीआरपीएफ जवान कश्मीर सिंह बड़े द्रवित मन से कहते हैं कि उन्हें अपने साथियों को खोने का तो दर्द है, लेकिन क्या करें, फोर्स में सब सहना पड़ता है। हर बात किसी से नहीं की जा सकती, लेकिन इतना जरूर है कि आतंकवाद की समस्या को जड़ से समाप्त होना चाहिए।
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