किसी को क्या पता था कि जालौन के माधौगढ़ रेंढर थाना क्षेत्र के छोटे से गांव परावर की प्रज्ञा ठाकुर कभी हिंदुत्व की चिंगारी बनेंगी। आज प्रज्ञा को देश ही नहीं दुनिया भी जानती है। प्रज्ञा को भाजपा ने मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से चुनाव मैदान में उतारा है। वह भी उनके धुर विरोधी पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के सामने, जिससे जालौन के लोगों की भी निगाहें इस रोमांचकारी मुकाबले पर टिक गईं हैं।
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साध्वी प्रज्ञा ठाकुर हिंदुत्व की चिंगारी, भोपाल में दिग्विजय से है टक्कर, रोमांचकारी होगा मुकाबला
Sat, 20 Apr 2019 05:14 AM IST
प्रभापुंज मिश्रा
यूपी डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
यूपी डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
Published by: प्रभापुंज मिश्रा
Updated Sat, 20 Apr 2019 05:14 AM IST
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प्रज्ञा सिंह ठाकुर (फाइल फोटो)
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साध्वी प्रज्ञा ठाकुर एवं दिग्वजय सिंह (फाइल फोटो)
गांव वालों का कहना है कि हम लोग भोपाल जाएंगे और बिटिया की हरसंभव मदद करेंगे। माधौगढ़ तहसील से करीब 28 किमी दूर स्थित बीहड़ के गांव परावर में आज भी प्रज्ञा ठाकुर का पुश्तैनी मकान है। हालांकि प्रज्ञा का जन्म मप्र के लहार में हुआ था, लेकिन उनके पिता चंद्र प्रकाश सिंह कभी यहां रहा करते थे। मध्य प्रदेश का भिंड इलाका परावर गांव के काफी नजदीक है।
साध्वी प्रज्ञा ठाकुर (फाइल फोटो)
70 के दशक में सीपी सिंह परावर से करीब 12 किमी दूर स्थित भिंड के लहार गांव में ग्राम सेवक की नौकरी के लिए पत्नी सरला के साथ जाकर बस गए। वहीं बेटियों उपना, प्रज्ञा, उत्तमा, प्रतिभा और एक बेटे की शिक्षा दीक्षा हुई। 2006 में प्रज्ञा भगवा धारण कर साध्वी बन गईं और संघ के लिए काम करने लगीं। 2008 में जब मालेगांव कांड में प्रज्ञा की गिरफ्तारी हुई तो परावर गांव में भी सन्नाटा सा छा गया था।
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प्रज्ञा ठाकुर के मकान के दरवाजे पर बैठे परिजनों संग ग्रामीण।
2013 में जब प्रज्ञा के पिता का निधन हो गया तो लोगों को लगा कि शायद प्रज्ञा अब कभी खुली हवा में सांस न ले सकेंगी। जेल से ही प्रज्ञा को पिता के अंतिम दर्शन के लिए लाया गया था। परावर गांव का सन्नाटा 2014 में भाजपा सरकार बनने के बाद ही टूटा। 2017 में प्रज्ञा की रिहाई हुई और अब वह भोपाल से चुनाव मैदान लड़ने की तैयारी में हैं। अब गांव के नाते रिश्तेदार ही नहीं, परावर गांव का बच्चा-बच्चा उनके साथ खड़े होने के लिए भी तैयार है।
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जानकारी देते प्रज्ञा के चचेरे भाई कर्णसिंह पत्नी के साथ।
2007 में भाई को टीका करने आई थी प्रज्ञा
जब भी प्रज्ञा को समय मिलता था वे परावर आया करती थीं। प्रज्ञा के पुश्तैनी मकान में रहने वाले चचेरे भाई कर्णसिंह बताते हैं कि आखिरी बार प्रज्ञा 2007 में उन्हें भाईदूज पर टीका करने आई थीं। इससे पहले मेरे पिता सूरज पाल के निधन पर भी प्रज्ञा आई थीं। कर्णसिंह के मुताबिक प्रज्ञा में बचपन से ही चंचलता के साथ-साथ समाजसेवा की भावना थी।
जब भी प्रज्ञा को समय मिलता था वे परावर आया करती थीं। प्रज्ञा के पुश्तैनी मकान में रहने वाले चचेरे भाई कर्णसिंह बताते हैं कि आखिरी बार प्रज्ञा 2007 में उन्हें भाईदूज पर टीका करने आई थीं। इससे पहले मेरे पिता सूरज पाल के निधन पर भी प्रज्ञा आई थीं। कर्णसिंह के मुताबिक प्रज्ञा में बचपन से ही चंचलता के साथ-साथ समाजसेवा की भावना थी।