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सरकारी जमीन पर बांग्लादेशियों का कब्जा, 1976 में पाकिस्तान से कानपुर आए थे 105 परिवार
आशुतोष मिश्रा, अमर उजाला, कानपुर
Updated Fri, 03 Aug 2018 01:03 PM IST
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पांच बीघा जमीन के पट्टे दिए थे बांग्लादेशियों को
कानपुर के प्रतापपुर में बांग्लादेशियों को आवंटित जमीन तहसील के रिकॉर्ड में सरकारी निकली है। इसलिए कहा जा सकता है कि बांग्लादेशी सरकारी जमीन पर अवैध रूप से काबिज हैं। दावा किया जाता है कि पुनर्वास विभाग ने 1976 में भौंती में बांग्लादेशियों को पांच-पांच बीघा जमीन आवंटित की थी। हकीकत यह है कि 42 साल बीतने के बाद भी खतौनी में यह जमीन सीलिंग (उत्तर प्रदेश जमीदारी विनाश एवं भूमि सुधार अधिनियम 1950 के तहत सरकारी कब्जे में ली गई जमीन) के नाम दर्ज है। यह बताने वाला कोई नहीं है कि अगर बांग्लादेशियों को पट्टे आवंटित किए थे तो उनका नाम खतौनी में क्यों नहीं चढ़ाया जा सका। अमूमन किसी को पट्टा आवंटित होता है तो खतौनी में उसका नाम चढ़ाया जाता है।
बांग्लादेशियों को आवंटित जमीन रिकार्ड में अब भी सरकारी
असम में नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजंस का अंतिम मसौदा जारी होने पर खुलासा हुआ है कि बरसों से असम में रहने के बावजूद 40 लाख लोग भारतीय नागरिक होने का सबूत नहीं दे सके। कानपुर में भी करीब आठ सौ बांग्लादेशी बिना नागरिकता लिए वोटर तक बने बैठे हैं। वर्ष 1976 में पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से 105 परिवार कानपुर आए थे। भारत सरकार ने इन्हें बांग्लादेश के विस्थापितों का दर्जा दिया था। तब पुनर्वास विभाग ने भौंती में बांग्लादेशियों को पट्टे आवंटित किए थे। तहसीलदार विजय यादव का कहना है कि बांग्लादेशियों को पट्टे आंवटित करने का कोई रिकार्ड तहसील में नहीं है। जिन जमीन पर बांग्लादेशी काबिज हैं, खतौनी में वह सीलिंग के नाम दर्ज है।
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खतौनी में नाम नहीं, तहसील के रिकार्ड में सीलिंग के नाम दर्ज है
बांग्लादेशियों के जमीन आवंटन का रिकार्ड न होने के कारण ही उन्हें कभी मुआवजा नहीं मिलता। मुआवजा पाने के लिए जमीन पर मालिकाना हक होना जरूरी होता है। तत्कालीन जिलाधिकारी डॉ. रोशन जैकब के समय ज्यादा पानी बरसने और ओले गिरने के दौरान फसलें नष्ट होने पर मुआवजा बांटा गया था। तब बांग्लादेशियों ने तत्कालीन डीएम से तहसील कर्मचारियों द्वारा मुआवजा का चेक न देने की शिकायत की थी। इस पर तत्कालीन तहसीलदार ने जिलाधिकारी को रिकार्ड निकालकर दिखाया था। कहा था कि जमीन पर मालिकाना हक न होने के कारण इन्हें मुआवजा नहीं दिया जा सकता है।
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पांच बीघा जमीन के पट्टे दिए थे बांग्लादेशियों को
बिना नागरिकता लिए वोटर बने बांग्लादेशियों के नाम काटे जाने की जांच रिपोर्ट की फाइल सदर तहसील में ढूंढी जाती रही। 2010 में तत्कालीन एसडीएम प्रहलाद सिंह की जांच रिपोर्ट दबा दी गई थी। इसके बाद 2016 में तत्कालीन एसडीएम डीडी वर्मा ने बांग्लादेशियों के नाम वोटर लिस्ट से काटे जाने नोटिस तामील कराए थे। इसके बाद यह फाइल अलमारी में बंद हो गई। तहसील के संबंधित बाबू गुरुवार को यह फाइल ढूंढते रहे।
आगे की स्लाइड में पढ़ें- जिलाधिकारी ने कही यह बात...
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बांग्लादेशियों को आवंटित जमीन रिकार्ड में अब भी सरकारी
अभी जिला प्रशासन का पूरा ध्यान बरसात से प्रभावित लोगों को राहत पहुंचाने पर है। बिना नागरिकता वोटर बने बांग्लादेशियों की जांच रिपोर्ट दो दिन बाद मंगाकर देखी जाएगी। इसके बाद कमेटी बनाकर इस मामले की जांच कराई जाएगी। बिना नागरिकता वोटर बने बांग्लादेशियों के नाम लिस्ट से हटवाए जाएंगे।
-विजय विश्वास पंत, जिलाधिकारी
-विजय विश्वास पंत, जिलाधिकारी