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ज्योति हत्याकांड: कई अदालतों में घूमी फाइल, 560 तारीखों में आया फैसला, पीड़ित परिजनों ने हार नहीं मानी

Fri, 21 Oct 2022 11:58 AM IST
शिखा पांडेय न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर Published by: शिखा पांडेय Updated Fri, 21 Oct 2022 11:58 AM IST
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Jyoti murder case: decision came in 560 dates, Victim family got justice
ज्योति हत्याकांड - फोटो : अमर उजाला

ज्योति हत्याकांड में पुलिस के चार्जशीट दाखिल करने के बाद 20 जनवरी 2015 को मुकदमा कोर्ट में दर्ज किया गया। 13 फरवरी को मुकदमे में पहली सुनवाई हुई। सात साल न्यायिक प्रक्रिया चली। 560 तारीखों पर सुनवाई हुई। तब जाकर गुरुवार को फैसला आया। एडीजीसी धर्मेंद्र पाल सिंह के मुताबिक केस में 45 लोगों की गवाही हुई। पुलिस ने मजबूत साक्ष्य रखे। पीड़ित परिजनों ने जान लगाकर पैरवी की। परिजनों ने इतना लंबा समय बीत जाने के बाद भी हार नहीं मानी। आखिरकार उनको न्याय मिला।



सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी फैसला आने में लग गए 20 माह
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद मुकदमे का फैसला आने में 20 महीने लग गए। पीयूष को हाईकोर्ट से जमानत मिली तो ज्योति के पिता शंकर नागदेव ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर जमानत खारिज करने की गुहार लगाई थी। सुप्रीम कोर्ट ने जमानत तो खारिज नहीं की लेकिन छह माह में मुकदमे के निस्तारण के निर्देश दिए थे।

Jyoti murder case: decision came in 560 dates, Victim family got justice
ज्योति हत्याकांड - फोटो : अमर उजाला
इसके बाद आशीष को मिली जमानत का विरोध करने पर सुप्रीम कोर्ट ने दोबारा चार माह में फैसला सुनाने के आदेश दिए लेकिन फैसला नहीं आ सका। अवधि खत्म होने पर अपर जिला जज ने समय मांगा तो चार माह का समय फिर दिया गया। इसके बाद दोबारा तीन महीने मिले लेकिन फैसला नहीं आया। तब 18 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने आखिरी बार तीन माह का समय देते हुए हर हाल में फैसला सुनाने के निर्देश दिए थे।
Jyoti murder case: decision came in 560 dates, Victim family got justice
ज्योति हत्याकांड - फोटो : amar ujala
पीयूष-मनीषा ने फर्जी नाम से लिए थे सिम
बांदा निवासी शंकर के नाम से टाटा कंपनी के दो सिम खरीदे गए थे। एक सिम पीयूष तो दूसरा मनीषा इस्तेमाल करती थी। इसी सिम के जरिए दोनों एक-दूसरे से बात करते थे और हत्यारों से बातचीत के लिए भी इन्हीं सिम का इस्तेमाल किया गया था। आईएमईआई नंबरों से सिम पीयूष व मनीषा के मोबाइल में लगाए जाने का खुलासा हुआ था। विवेचना में पता चला कि शंकर नाम का कोई व्यक्ति बांदा के पते पर रहता ही नहीं है। फर्जी सिम मामले में एक अलग मुकदमा स्वरूप नगर पुलिस ने पीयूष, मनीषा और फर्जी सिम बेचने वाले दुकानदार के नाम से दर्ज किया था। वर्ष 2014 में ही चार्जशीट आ गई थी। तीनों को जमानत भी मिल चुकी है। मुकदमा निचली अदालत में लंबित है।
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ज्योति हत्याकांड - फोटो : अमर उजाला
अभियुक्तों के पक्ष में आई थी डीएनए रिपोर्ट
विधि विज्ञान प्रयोगशाला लखनऊ से अगस्त 2018 में आई डीएनए रिपोर्ट ने केस का रुख ही मोड़ दिया था। ज्योति के नाखूनों पर लगे बाल और मांस के रेशों को डीएनए परीक्षण के लिए 2014 में प्रयोगशाला भेजा गया था लेकिन परीक्षण रिपोर्ट में अभियुक्त पीयूष, अवधेश, रेनू, सोनू और आशीष के बाल और मांस से इनका मिलान नहीं हुआ था।
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ज्योति हत्याकांड - फोटो : अमर उजाला
इसी प्रकार रेनू उर्फ अखिलेश और सोनू के कपड़ों पर लगे खून को भी परीक्षण के लिए भेजा गया था लेकिन दोनों के कपड़ों पर लगे खून और ज्योति के खून का मिलान भी नहीं हुआ। हालांकि रेनू के पास से हत्या में प्रयुक्त चाकू बरामद हुआ था इस पर लगा खून ज्योति का होने की पुष्टि जरूर रिपोर्ट में की गई थी।
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