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कामदगिरी से लेकर 'भरतकूप' और 'तुलसीदास', कुछ ऐसा है यूपी की 'धर्मनगरी का इतिहास'
अभिषेक त्रिपाठी, कानपुर
Updated Wed, 03 Oct 2018 08:45 AM IST
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चित्रकूट
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मंदाकिनी नदी के किनारे बसा चित्रकूट धाम भारत का सबसे प्रचीन तीर्थस्थल है। उत्तर प्रदेश में 38.2 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला शांत और सुंदर चित्रकूट जिला प्रकृति और ईश्वर की अनुपम देन है। चारों ओर से विन्ध्य पर्वत श्रृंखलाओं और वनों से घिरे चित्रकूट को अनेक आश्चार्यों की पहाड़ी कहा जाता है। मंदाकनी नदी के किनारे बने अनेक घाट और मंदिर में पूरे साल श्रध्दालुओं का आना जाना लगा रहता हेै।
कामदगिरि पर्वत
इस पवित्र पर्वत का काफी धार्मिक महत्व है। श्रध्दालु कामदिगिरी पर्वत की 5 किलोमीटर की परिक्रमा कर अपनी मनोकामनाएं पूर्ण होने की कामना करते हैं। जंगलों से घिरे इस पर्वत के तल पर अनेक मंदिर बने हुए हैं। चित्रकूट के लोकप्रिय कामतानाथ और भरत मिलाप मंदिर भी यहीं स्थित हैं। पहाड़ी के शिखर पर स्थित हनुमान धारा में हनूमान की एक विशाल मूर्ति के सामने तालाब में झरने से पानी गिरता है। कहा जाता है कि यह धारा श्रीराम ने लंका दहन से आए हनुमान के आराम के लिए बनावाई थी। पहाड़ी के शिखर पर ही सीता रसोई है। यहां से चित्रकूट का सुन्दर दृश्य देखा जा सकता है।
आगे की स्लाइड में पढ़ें- भरतकूप के पीछे की कहानी...
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भरतकूप
कहा जाता है कि भगवान राम के राज्याभिषेक के लिए भरत की सभी नदियों से जल एकित्रत कर यहां रखा गया था। अत्रि मुनि के परामर्श पर भरत ने जल एक कूप में रख दिया था। इसी कूप को भरतकूप के नाम से जाना जाता है। भगवान राम को समिर्पत यहां एक मंदिर भी है।
आगे की स्लाइड में पढ़ें- तुलसीदास के जीवन से जुड़ी खास बातें...
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तुलसीदास
विद्वान तुलसीदास का जन्म स्थान राजापुर है। राजापुर उत्तर प्रदेश के चित्रकूट जिला के अंतर्गत स्थित एक गांव है। वहां आत्माराम दुबे नाम के एक प्रतिष्ठित सरयूपारीण ब्राम्हण रहते थे। उनकी धर्मपत्नी का नाम हुलसी था। संवत् 1511 के श्रावण मास के शुक्लपक्ष की सप्तमी तिथि के दिन अभुत्क मूल नक्षत्र में इन्हीं दम्पति के यहां तुलसीदास का जन्म हुआ। प्रचलित जनश्रुति के अनुसार शिशु बारह महीने तक मां के गर्भ रहने के कारण अत्यधिक हष्ट पुष्ट थे और उनके मुख में दांत दिखाई दे रहे थे। जन्म लेने के साथ ही उन्होंने राम नाम का उच्चारण किया जिससे उनका नाम 'रामबोला' पड़ गया। उनके जन्म के दूसरे ही दिन उनकी मां का निधन हो गया। पिता ने किसी और अनिष्ट से बचने के लिए बालक को चुनियां नाम की एक दासी को सौंप दिया और स्वयं विरत्क हो गए।