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सिक्किम आपदा में फंसे लोगों ने सुनाई आपबीती, कहा- पहाड़ पर बादल फटा तो लगा जैसे कयामत आ गई

Mon, 24 Jun 2019 04:48 PM IST
शिखा पांडेय यूपी डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
यूपी डेस्क, अमर उजाला, कानपुर Published by: शिखा पांडेय Updated Mon, 24 Jun 2019 04:48 PM IST
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following heavy and incessant rains people from kanpur saying they will not forget Sikkim disaster
रेंजिंग चिवांग के परिवार के साथ अश्रिता शुक्ला व उनका परिवार - फोटो : अमर उजाला

सिक्किम की डोंगमार झील के चारों तरफ कुदरती खूबसूरती के बीच बौद्ध देव स्थल के दर्शन करके हम लोग करीब 12 किमी की दूरी तय कर 16 जून को लाचेन गांव लौट आए। हम लाचेन के ही रहने वाले रेंजिंग चिवांग के परिवार के साथ ठहरे थे। लौटने के कुछ देर के बाद बारिश होने लगी। इसी बीच बादल फट गया। लगा कि कयामत आ गई।

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हर तरफ पानी ही पानी नजर आने लगा। इसके बाद भूस्खलन शुरू हो गया। रास्ते पहाड़ों से धंसी जमीन में दफन हो गए। हम उसी गांव में कैद होकर रह गए। बिजली गायब, हर तरफ अजीब आवाजें और घुप अंधेरा। चार दिन हम उसी गांव में कैद रहे।

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बादल फटने और भूस्खलन की यह आपबीती और आंखों देखी घटना है, जिसे याद कर कानपुर के रतन ऑर्बिट, इंदिरानगर की रहने वाली अश्रिता शुक्ला, उनके पति मोहम्मद फहद, बिजनेसमैन पिता उमेश शुक्ला और मां अंजना शुक्ला सिहर उठती हैं।

 

अमर उजाला संवाददाता ने रविवार को जब उनसे बात की तो लगा जैसे पहाड़ी गांव की अंधेरी रात का वह खौफनाक मंजर उनकी आंखों के सामने तैर रहा हो। अश्रिता बताती हैं कि 17 जून को हम लोगों ने निकलने की कोशिश की। बोलेरो किराये पर ले रखी थी।

जब निकले तो देखते हैं कि रास्ता गायब है। वाहन वहीं छोड़ दिया। सेना के जवान लोगों को रेस्क्यू करते रहे। अस्थायी पुल बना दिया। लोगों को बचाकर गांव तक पहुंचाया। अश्रिता रेंजिंग और उनके गांवों वालों की तारीफ करते नहीं थकतीं। बताती हैं कि सेना ने तो लोगों के खाने-पीने का इंतजाम किया। इसके अलावा गांववाले भी पर्यटकों के खाने-पीने का इंतजाम करते रहे।
 

अब तो अधिकांश लोग कैश के बजाय एटीएम कार्ड लेकर चलते हैं। आपदा में फंसे लोगों के पास पैसा भी नहीं था। गांववालों ने किसी मेहमान से पैसा नहीं मांगा, जो दे दिया रख लिया। उनका बहुत अच्छा बर्ताव रहा है। हम सुरक्षित आ गए, लेकिन अब भी वह दृश्य जब जेहन में कौंधता है तो सिहर जाते हैं।

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