भरे गुस्से में अगर कोई इस शहर में आ जाए तो वो हंस-हसंते हो जाएगा पागल: संजय मिश्रा
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संजय ने अपना एक अनुभव साझा करते हुए बताया कि साल 2009 की बात थी जब वह काफी बीमार हो गए और मजबूरी में अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। बगल वाले वार्ड में एक महिला भर्ती थी जिसका लिवर ट्रांसप्लांट होना था। जब उस मरीज के घरवालों को पता चला कि इसी अस्पताल में मैं भी एडमिट हूं तो वो लोग मेरे पास आए। उन्होंने बताया कि लिवर खराब होने की वजह से वह महिला कई दिनों से दर्द से कराह रही है। वह चाहती है कि उसे इस जिंदगी से आजादी मिल जाए। मैं भी अस्पताल में बीमारी की वजह से भर्ती था। मैं जब उस महिला के पास पहुंचा तो वह मुझे देखते ही मुस्करा उठी। बस उस दिन से मुझे ऐसा लगा कि मैंने बहुत बड़ा अवार्ड जीत लिया है। क्योंकि जो इंसान भीषण दर्द के साथ जिंदगी और मौत से जूझ रहा है मेरा चेहरा देखते ही उसके चेहरे पर हंसी छूट जाए इससे बड़ी तपस्या मेरे लिए कुछ भी नहीं थी। संजय अपने बारे में बताते हैं कि वह कभी भी अपने आप को बूढ़ा नहीं महसूस होने देते। उनका कहना है कि जब तक इंसान जिंदा है तब तक वह जवान है, जब तक मौत नहीं आ जाती वह जवान है।
आगे की स्लाइड में पढ़ेंः- सफर का असली मजा तो ट्रेन की यात्रा में....
आगे की स्लाइड में पढ़ेंः- कलाकार और पत्रकार का नजरिया बिल्कुल अलग...
संजय ने बताया कि दुनिया को देखने का नजरिया एक पत्रकार और कलाकार का बिल्कुल अलग ही होता है। ये सभी दुनिया को बहुत दूर से और अलग ढंग से देखते हैं जिसकी वजह से उन्हें लोगों को समझने में परेशानी नहीं होती। आम लोगों को भी ऐसा ही नजरिया रखना चाहिए। संजय ने उदाहरण देते हुए कहा कि सड़क पर अगर दूसरी गाड़ी वाला आपका को इंडिकेटर तोड़ दे तो आप को गुस्सा बिल्कुल भी नहीं होना चाहिए। सामने वाले की मनोदशा को समझना बहुत जरूरी है। क्या पता कि सामने वाला जिसने आप की गाड़ी की इंडिकेटर तोड़ा है वह आप से भी ज्यादा परेशान है। दुनिया को अगर हम दूर के नजरिए से देखते हैं तो हमें कभी गुस्सा नहीं आता और इससे हमारी समझ भी विकसित होती है।
आगे की स्लाइड में पढ़ेंः- जब अनुपम श्याम ने मेरी दोस्त का माथा चूम लिया...
संजय मिश्रा ने अपने दोस्त अनुपम श्याम का एक किस्सा सुनाया। उन्हें बताया कि एक बार वह मुंबई में अपनी एक बेहद खूबसूरत दोस्त के साथ बैठे हुए थे। उसी दौरान उनके खास दोस्त अनुपम श्याम भी आ गए। जब मैंने अनुपम श्याम को बताया कि यह मेरी दोस्त हैं तो उन्होेंने फौरन उस लड़की का माथा चूम लिया और कहा कि- ‘बहुत खूबसूरत और अच्छी दोस्त हैं’। जब मैंने यह बताया कि वह लखनऊ से है तो वह और भी ज्यादा खुश हो गए और उसका एक बार फिर माथा चूमा और कहा कि मैं भी प्रतापगढ़ से हूं। लखनऊ तो मेरा ही शहर है। यहां के लोग बहुत अच्छे होते हैं।
आगे की स्लाइड में पढ़ेंः- ऑफिस-ऑफिस के ‘शुक्ला जी’ सबसे पसंदीदा कैरेक्टर...