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यहां होती है जूतामार होली: भैंसागाड़ी पर निकलते हैं लाट साहब, कोतवाल देते हैं सलामी और नेग, अनूठी है परंपरा

Thu, 02 Mar 2023 12:40 PM IST
मुकेश कुमार संवाद न्यूज एजेंसी, शाहजहांपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, शाहजहांपुर Published by: मुकेश कुमार Updated Thu, 02 Mar 2023 12:40 PM IST
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laat sahab joolus jutamar holi history in shahjahanpur
लाट साहब का जुलूस - फोटो : अमर उजाला

ब्रज की लठमार होली की तरह शाहजहांपुर की जूतामार होली भी देशभर में चर्चित है। होली के रंग-गुलाल के साथ जूते-चप्पलों की बौछार के बीच भैंसागाड़ी पर लाट साहब की सवारी पूरे ठाठ के साथ निकलती है। इतिहासकारों के अनुसार यह परंपरा अंतिम नवाब अब्दुल्ला खां द्वारा 1746-47 में किले पर पुन: कब्जा करने के बाद शुरू हुई थी। पहले जुलूस में हाथी, घोड़े, ऊंट आदि शामिल होते थे। स्थानीय लोगों के विरोध और बेपर्दगी के चलते लाट साहब की सवारी भैंसागाड़ी तय कर दी गई।



रंगों और उल्लास के पर्व होली पर लाट साहब का जुलूस निकालने और नवाबों के साथ होली खेलने की परंपरा की कोई निश्चित तिथि तो इतिहास में दर्ज नहीं है, लेकिन यह परंपरा करीब पौने तीन सौ साल पुरानी बताई जाती है। इतिहासकार नानक चंद्र मेहरोत्रा ने अपनी पुस्तक ‘शाहजहांपुर ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक धरोहर’ में लिखा है कि अंतिम नवाब अब्दुल्ला खां हिंदू और मुस्लिम समुदाय में समान रूप से प्रिय थे। उन्होंने अपनी बेटी की शादी हाफिज उल मुल्क से करने के लिए किले के निकट रंगमहल बनवाया था। वर्तमान में इसे रंगमहला कहा जाता है।

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लाट साहब का जुलूस। - फोटो : अमर उजाला

किले के बाहर होली खेलते थे नवाब

होली के अवसर पर नवाब अब्दुल्ला किले के बाहर आकर होली खेलते थे। उनके किले से निकलते ही लोग- ‘नवाब साहब निकल आए’ कहते हुए चिल्लाने लगते थे। नवाब साहब के न रहने पर भी जुलूस निकलना बंद नहीं हुआ। बाद में इसका नाम लाट साहब का जुलूस कर दिया गया।
 
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लाट साहब का जुलूस - फोटो : अमर उजाला
इतिहासकार नानकचंद्र मेहरोत्रा बताते हैं कि पूर्व में होली के जुलूस के दौरान हाथी, घोड़े और ऊंट निकलते थे। उस समय भी जुलूस में बड़ी संख्या में लोग शामिल होते थे। बड़े जानवरों के कारण दूसरे समुदाय के लोगों ने अपने घर की दीवारों के नीची होने के चलते बेपर्दगी होने की बात कहते हुए विरोध किया। यह बात सरकार तक पहुंची तो जुलूस में हाथी, घोड़े और ऊंट शामिल करने पर प्रतिबंध लगा दिया गया। इसके बाद लाट साहब भैंसागाड़ी पर निकलने लगे।
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लाट साहब का जुलूस - फोटो : एएनआई

टकराव के चलते बदला नाम

1947 में दो समुदायों के मध्य टकराव की आशंका के चलते होली पर नवाब का जुलूस निकालने पर प्रतिबंध लगाने की मांग की गई। नगर के बद्धिजीवियों ने भी इसके लिए प्रयास किए, लेकिन असफल रहे। हालांकि बाद में इसका नाम नवाब साहब के जुलूस की जगह लाट साहब का जुलूस कर दिया गया।
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लाट साहब का जुलूस - फोटो : अमर उजाला

कोतवाल देते हैं सलामी और नेग

इतिहासकार डॉ. विकास खुराना बताते हैं कि चौकसी से निकलने वाले लाट साहब का जुलूस पहले कोतवाली पहुंचता है। जहां कोतवाल सलामी देने के साथ ही लाट साहब को नेग देते हैं। वहां से विभिन्न मार्गों से होकर जुलूस गुजरता है। लाट साहब के सिर पर जूते-चप्पलों की मार पड़ती है। कुछ जगह फूलों से स्वागत भी होता है।
 
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