संगम की रेती पर आस्था के महापर्व माघ मेले के आरंभ होने में चौबीस घंटे ही शेष रह गए हैं। वहीं रेती पर कल्पवास करने के लिए श्रद्धालुओं का दूर-दूर से आने का सिलसिला भी जारी है। लेकिन, प्रशासन की तमाम कोशिशों के बावजूद मेले में न सामान्य व्यवस्थाएं पूरी हो सकी हैं और न ही आम श्रद्धालुओं के लिए मूलभूत सुविधाएं ही मुहैया कराई जा सकी हैं। दलदल की दिक्कतों के साथ बारिश ने ‘कोढ़ में खाज’ का काम किया है।
माघ मेले में हुई मुसीबतों की बारिश, जलजमाव, कीचड़ से फिसलन
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सड़क, बिजली, पानी, शौचालय तो दूर चकर्ड प्लेट बिछाने और पांटूल पुलों की व्यवस्था भी पूरी तरह से दुरुस्त नहीं हो सकी है। इसी बीच बारिश ने मेले की तैयारियों को कई दिन पीछे क र दिया है। हर्षवर्धन चौराहे से संगम नोज तक का रास्ता तय करने में सारी तैयारियों की कलई खुल जाती है। दलदल से होने वाली दिक्कतें अभी दूर ही नहीं हुई थीं, पानी से मेले में कीचड़, फिसलन से दिक्कतें दो गुनी हो गईं। चकर्ड प्लेटों पर जमी मिट्टी में बारिश से ऐसी फिसलन हो गई है कि दो पहिया वाहनों से या फिर पैदल चलना भी मुसीबत का सबब बन गया है।
संभलकर न चलने वालों की पूरे दिन आफत रही। प्रयागराज मेला प्राधिकरण सेक्टर से संगम थाने की ओर जाने वाली सड़क पर दर्जन भर से ज्यादा लोग फिसले और दो पहिया वाहनों से दुर्घटनाएं हुईं। महावीर मार्ग, अक्षयवट, कालीमार्ग, संगम अपर, संगम लोअर, जगदीश रैंप सहित मेले की तमाम सड़कों पर ऐसी ही मुसीबतों का बोलबाला रहा।
महावीर मार्ग से दक्षिण की ओर मुड़कर संगम लोअर मार्ग की पूर्वी पट्टी पर, खाक चौक के सामने आधी सड़क पर अब तक चकर्ड प्लेट नहीं पड़ सकी है। जरा सी असावधानी पर गाड़ियां दलदल या बालू में फंस रही हैं। इसी तरह जल निकासी की भी कोई व्यवस्था नहीं है। सेक्टर तीन और सेक्टर चार दोनों में कमोवेश ऐसी ही अव्यवस्थाएं हैं। बिना चकर्ड प्लेट कीचड़ और फिसलन से शिविरों तक सामान पहुंचाने में काफी दिक्कतें आ रही हैं। इसके अतिरिक्त यमुना पट्टी सहित किले से महावीर मार्ग की ओर बढ़ने पर पटरी के किनारे लगी चाय-पान, माला-सिंदूर, डिब्बे, प्रसाद की दुकानों के सामने भी जलजमाव और कीचड़ की स्थिति है। वहीं रेत का बंदोबस्त करना महंगा और मुश्किल है, ऐेसे में लोगों को दुकानों या शिविरों तक जाने में काफी घूमकर जाना पड़ रहा है।
पुलों पर जाम, फिसलन से मुसीबत
बुधवार को काली मार्ग पर झूंसी की ओर जाने वाले छोटे पुल पर जबर्दस्त जाम लगा रहा क्योंकि पुल पर बिछाई गई चकर्ड प्लेट पर मिट्टी जमी होने के कारण फिसलन बढ़ गई थी। इस पर से होकर झूंसी की ओर जाने वाली गाड़ियां जरा सी असावधानी में पीछे की ओर लुढ़ककर चली आ रही थीं। दारागंज के राजेश वर्मा और उनके साथी को कई कोशिश के बाद सफलना नहीं मिली तो उन्होंने रास्ता ही बदल दिया। इसी तरह पुल नंबर एक पर भी पश्चिम से पूरब की ओर जाना टेढ़ी खीर रहा। पांटून पुल का पूर्वी छोर इतना ऊंचा बनाया गया है कि चार पहिया वाहनों और ट्रैक्टर ट्राली को उस पर चढ़ाना खतरे को दावत देने जैसा ही रहा।