मोरारी बापू ने अपनी रामकथा में नए प्रयोगों को लेकर हमेशा सुर्खियां बटोरते रहे हैं। बृहस्पतिवार को वह अचानक एक निषाद के घर पहुंच गए। वहां उन्होंने निषाद की बेटी के हाथ बना भोजन ग्रहण कर छूआछूत और गैर बराबरी के खिलाफ सामाजिक एकता, प्रेम व समरसता का संदेश दिया।
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शाम करीब छह बजे संत मोरारी बापू लवायन कला गांव जाने वाले रास्ते पर मवैयां गांव के रमेश चंद्र निषाद के घर केसामने रुक गए। सड़क केकिनारे उनकी गाड़ी रुकी तो साथ में कई गाड़ियां खड़ी हो गईं। कुछ पुलिस वाले फटाफट उतरकर आसपास खड़े हो गए। देखते-देखते लोगों की भीड़ लग गई। रमेश को लगा कि गांव में कोई घटना हो गई है, इसलिए पुलिस आ गई है।
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लोग कुछ समझ पाते तबतक पीले वस्त्र में एक संत कार से उतरे और पड़ोस के नल से पानी लेने के लिए जा रही रमेश की पुत्री शीलू निषाद से संत के लिए भिक्षा देने का आग्रह करने लगे। शीलू से संतों ने पूछा कि बिटिया भिक्षा मिल जाएगी क्या? रमेश ने बताया कि पहले उन्होंने सोचा कि आटा-दाल की भिक्षा लेकर चले जाएंगे, लेकिन कुछ ही देर में जब पता चला कि कार में बैठे संत कोई और नहीं बल्कि मोरारी बापू हैं और वह उनके घर भोजन करना चाहते हैं तो फिर उन लोगों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा।
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शीलू दौड़कर कार केपास गई और वह मोरारी बापू को बुलाकर अपने घर ले आई। बापू संतों केसाथ चारपाई पर बैठे। उन्होंने शीलू से रोटी, सब्जी तत्काल बनाकर खिलाने के लिए कहा। उन्होंने निषाद परिवार के सदस्यो से कहा कि कुछ भी मंगाने की जरूरत नहीं है। जो घर में उपलब्ध हो वही खिलाना। पीसीएस प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी में जुटी शीलू ने अपनी मां सावित्री के साथ मिलकर रोटी, आलू, मटर और टमाटर की सब्जी, धनिया की चटनी बनाकर भोजन की थाली परोसी। अमीन रहे रमेश की वर्षों पहले छत से गिरने की वजह से दोनों आंखों की रोशनी चली गई है। रमेश ने बताया कि उन्होंने कभी सोचा नहीं था, मोरारी बापू उनकी चारपाई पर बैठकर भोजन करेंगे।