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कुंभ 2019: यहां इसलिए दौड़े चले आते हैं विदेशी श्रद्धालु?

Tue, 05 Feb 2019 04:34 PM IST
shubham समीरात्मज मिश्र, प्रयागराज
समीरात्मज मिश्र, प्रयागराज Published by: shubham Updated Tue, 05 Feb 2019 04:34 PM IST
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Kumbh mela 2019 why foreigner sadhu Devotees come to sangam prayagraj
kumbh photo 2019

15 जनवरी को कुंभ के पहले शाही स्नान यानी मकर संक्रांति को संगम तट पर जहां अखाड़ों के साधु स्नान कर रहे थे, उनसे कुछ ही मीटर की दूरी पर स्नान कर रहे सफद वस्त्र धारी कई विदेशी श्रद्धालु भी लोगों के आकर्षण का केंद्र बने हुए थे। उन्हीं में अमेरिका से आए ऑस्टिन भी थे।ऑस्टिन और उनके साथी 'गंगा मैया की जय' और 'हर-हर गंगे' का नारा लगा रहे थे। 



उनके साथ करीब दो दर्जन लोग थे जिनमें कई महिलाएं भी थीं। अखाड़ों के साथ ये लोग भी नाचते-गाते और वाद्य यंत्रों के साथ स्नान करने आए थे। साफ-सुथरी हिन्दी में ऑस्टिन बताने लगे, "हम लोग पिछले एक हफ्ते से यहां आए हुए हैं और टेंट में रह रहे हैं। हमारे सभी साथी एक महीने रहकर कल्पवास करेंगे। हमारी कम्युनिटी के 100 से ज्यादा लोग यहां आए हुए हैं जो अमेरिका समेत कई अन्य देशों से भी हैं।"

Kumbh mela 2019 why foreigner sadhu Devotees come to sangam prayagraj
foreigner Saints

ऑस्टिन उस रैंबो इंटरनेशनल कम्युनिटी के सदस्य हैं, जो दुनिया भर में सनातन धर्म और संस्कृति का प्रचार प्रसार कर रहे हैं। इस कम्युनिटी के ही तमाम लोग इस समय कुंभ में भी आए हुए हैं और एक महीने यहीं रहकर कल्पवास करेंगे। रैंबो कम्युनिटी के अलावा भी तमाम साधु-संतों के शिविरों में और अखाड़ों में भी बड़ी संख्या में विदेशी श्रद्धालुओं के अलावा विदेशी संत भी दिख जाते हैं। रैंबो कम्युनिटी की ही एक अन्य सदस्य और जर्मनी के म्यूनिख शहर की रहने वाली एनी संन्यासियों के वेश में रहती हैं।वो कहती हैं, "मैं करीब तीन साल से भारत में आती-जाती रहती हूं और अपने गुरु के आश्रम में ही रहती हूं। शांति की खोज में यहां तक आ गई और लगता है कि इसी सनातन धर्म में ये सब मिल सकता है, कहीं और नहीं।" एनी अभी हिन्दी ठीक से नहीं बोल पातीं, लेकिन उनका कहना है कि वो सीख रही हैं और जल्दी ही अच्छी हिन्दी बोलने में सक्षम हो जाएंगी। कुंभ मेले में वो पहली बार आई हैं लेकिन इंटरनेट पर इसके बारे में उन्होंने काफी कुछ पढ़ा है और यहां आकर उन्हें 'दिव्य' अनुभूति हो रही है।

Kumbh mela 2019 why foreigner sadhu Devotees come to sangam prayagraj
mauni amavasya crowed

कुंभ में आने वाले विदेशी श्रद्धालु और संत नए साल से ही आने लगे थे। बहुत से श्रद्धालु तो पर्यटक के तौर पर आए हैं और लक्जरी कॉटेज में रुके हैं लेकिन जहां तक विदेशी संतों का सवाल है तो किसी ने किसी आश्रम, महंत और अखाड़ों से जुड़े हैं और उन्हीं के संपर्क में यहा हैं। अखाड़ों से जुड़े संत शाही स्नान में भी शामिल होते हैं और अखाड़ों की पेशवाई का भी हिस्सा बनते हैं।

महामंडलेश्वर की भी मिली उपाधि

आनंद अखाड़े से जुड़े डेनियल मूल रूप से फ्रांस के रहने वाले हैं लेकिन अब वो भगवान गिरि बन गए हैं। भगवान गिरि अखाड़े के महंत देवगिरि के शिष्य हैं और पिछले तीस साल से वो भारत में रहते हुए न सिर्फ भारतीय परिधान पहनते हैं बल्कि पूरी तरह से भारतीय संस्कृति में ही रचे-बसे हैं।विदेशी संन्यासी न सिर्फ अखाड़ों में रहकर संतों का जीवन बिता रहे हैं बल्कि कई ऐसे भी हैं जिन्हें महामंडलेश्वर जैसी उपाधियां भी मिली हैं। महानिर्वाणी अखाड़े से जुड़े स्वामी ज्ञानेश्वर पुरी भी ऐसे ही संत हैं जिन्होंने सालों पहले संन्यास ले लिया था। ज्ञानेश्वर पुरी अपने तमाम देशी और विदेशी शिष्यों के साथ इस बार कुंभ में महानिर्वाणी अखाड़े के संतों के साथ शाही स्नान भी कर रहे हैं।

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Kumbh mela 2019 why foreigner sadhu Devotees come to sangam prayagraj
Foreigner sadhvi

विदेशी संन्यासी स्थानीय लोगों के भी आकर्षण का केंद्र हैं। जहां कहीं भी कोई संन्यासी दिखता है लोग उससे बात करने और मेल-जोल बढ़ाने की कोशिश करने लगते हैं, खासकर तब जबकि कोई हिन्दी में बात करता मिलता है। जौनपुर से आए साठ वर्षीय विद्याशंकर तिवारी आध्यात्मिक रंग में रंगे ऐसे संन्यासियों को देखकर मंत्रमुग्ध नजर आए। कहने लगे, "सात समुंदर पार के इन लोगों को हमारी संस्कृति इतनी अच्छी लगती है लेकिन अपने देश के लोग इसे नष्ट करने पर तुले हुए हैं।" सेक्टर 14 स्थित जूना अखाड़े के शिविर के भीतर प्रवेश करने पर दोनों ओर नागा साधु धूनी रमाए बैठे थे। आगे जाने पर बड़े से पांडाल में प्रवचन चल रहा था। सामने एक बुज़ुर्ग रूसी महिला मिलीं जो अपने टेंट से निकलकर प्रवचन सुनने जा रही थीं। हल्की सी मुस्कराहट के साथ दोनों हाथ जोड़कर 'ओम नमो नारायण' कहकर उन्होंने अभिवादन किया।

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Foreigner sadhvi

'यह देखने आ करोड़ों लोग सिर्फ नहाने क्यों आते हैं'
टूटी-फूटी हिन्दी में बताने लगीं, "मेरे गुरुजी ने मेरा नाम गंगापुरी रखा है और अब मैं इसी नाम से जानी जाती हूं। मैं रूस की रहने वाली हूं और पिछले 35 साल से भारत में ही रह रही हूं। मैं प्रयाग के अलावा हरिद्वार, नासिक और उज्जैन के कुंभ में भी कई बार जा चुकी हैं। वैसे तो मैं यहां पढ़ाई करने आई थी लेकिन हरिद्वार में मेरी मुलाकात कुछ साधु-संतों से हुई और फिर दो-तीन साल के बाद मैंने संन्यास ले लिया। संन्यास लेने के बाद मैं कभी रूस नहीं गई।"अखाड़ों के अलावा भी कई आध्यात्मिक गुरुओं के शिविरों में विदेशी संत रह रहे हैं। मसलन सच्चा बाबा आश्रम के शिविर में तमाम संत फ्रांस, जर्मनी, इंग्लैंड, ऑस्ट्रिया, स्लोवाकिया जैसे यूरोपीय देशों के अलावा दक्षिण अमरीकी देशों से भी हैं। सच्चा बाबा आश्रम में पर्यटक के तौर पर कुंभ मेला देखने आए ऑस्ट्रेलिया के एक व्यक्ति ने अपने आने का उद्देश्य कुछ इस तरह बयां किया, "मैं तो सिर्फ ये देखने आया हूं कि आखिर यहां ऐसा क्या है कि करोड़ों लोग सिर्फ नदी में नहाने के लिए चले आते हैं। ऐसा अद्भुत दृश्य मैंने पहले कभी नहीं देखा। यहां आकर पता चला कि अध्यात्म क्या चीज है. मुझे आए हुए एक हफ्ता हो गया है, हिन्दी नहीं समझता हूं, लेकिन महात्माओं के प्रवचन सुनने जाता हूं। साथ में स्वामी जी रहते हैं जो हमें अंग्रेजी में सब कुछ समझा देते हैं।" दरअसल, ऐसा नहीं है कि मेले में पहली बार कोई विदेशी श्रद्धालु या संत आए हों बल्कि हमेशा से आते रहे हैं।
 

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