धर्म और अध्यात्म के महासंगम कुंभ नगरी में करोड़ों की भीड़ में बहुत कुछ ऐसा भी है, जिसे देखना अपने आप में अचंभित करने वाला है। कहने को तो सभी अखाड़ों की संस्कृति, धर्म और रीति-नीति में बहुत ज्यादा अंतर नहीं है लेकिन वैभव के नजरिए से इनमें जमीन-आसमान का अंतर दिखाई पड़ रहा है।
कुंभ के दो शाही स्नान पूरे होने के बाद सभी 13 अखाड़ों में कुल मिलाकर करीब 40 हजार नए संन्यासी बनाए गए हैं। यदि सभी अखाड़ों में बनने वाले संन्यासियों की संख्या के हिसाब से देखा जाए तो 35 हजार संन्यासी अकेले तीन अखाड़ों में ही बने हैं। सबसे आगे जूना अखाड़ा फिर निरंजनी और महानिर्वाणी अखाड़ा है। बाकी 10 अखाड़ों में अलग-अलग संख्या के आधार पर सिर्फ पांच हजार नए संन्यासियों ने इस कुंभ में अभी तक दीक्षा ली है।
अखाड़ों में संन्यासी बनने की इस संख्या के पीछे का अर्थशास्त्र काफी चौंकाने वाला है। जूना अखाड़ा सभी में बड़ा और वैभवशाली है। प्रत्येक कुंभ में इस अखाड़े से संन्यासी बनने वालों की संख्या सबसे ज्यादा रहती है। इस बार भी यह 15 हजार से अधिक पहुंच चुकी है। अटल, आवाहन, अग्रि जैसे अखाड़ों में संन्यासी बनने वालों की संख्या काफी कम है। इसके पीछे इनका मैनेजमेंट काफी कमजोर होना बताया जाता है। बैरागी अखाड़ों की स्थिति भी इसी तरह की है।
शंकराचार्य नरेंद्रानंद सरस्वती का कहना है कि जूना का वैभव सबसे अलग है। यही वजह है कि उससे ज्यादा लोग जुडऩा चाहते है। वह अपने संयासियों के प्रति अधिक उदार है। महामंडलेश्वर स्वामी यतींद्रानंद गिरी ने बताया कि जिस अखाड़े के जितने ज्यादा महामंडलेश्वर समझिए उसके उतने ज्यादा शिष्य बनेंगे। जूना इसमें सबसे आगे हैं। शांभवी पीठाधीश्वर स्वामी आनंद स्वरूप का कहना है कि सनातन परंपरा में संन्यास धारण करने के बाद सब एक समान हो जाते हैं, लेकिन पिछले कुछ समय से अपने को वैभवशाली दिखाने की होड़ संतों में दिखने लगी है, जिससे कई विकृतियां भी आ गई हैं, इसे दूर करने की आवश्यकता है।
महामंडलेश्वर दिखाते हैं अपनी ताकत
हर अखाड़े के महामंडलेश्वर अपनी प्रतिभा और ताकत दिखाने के लिए कुंभ के अवसर पर अधिक से अधिक लोगों को संन्यासी बनवाने की भूमिका निभाते हैं। इसमें जूना, निरंजनी और महानिर्वाणी में सक्रियता अधिक दिखती है।