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कुंभ में नागा साधु कहां से आते हैं, कैसे नागा बनते हैं और मेले के बाद कहां चले जाते हैं, पढ़ें सबकुछ

Tue, 22 Jan 2019 11:27 PM IST
देव कश्यप न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रयागराज
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रयागराज Published by: देव कश्यप Updated Tue, 22 Jan 2019 11:27 PM IST
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kumbh Mela 2019 hidden life facts about the mystery world of Naga sadhus itihas where lives
Naga Sadhu

अक्सर कुंभ मेले में नजर आने वाले नागा साधु आखिर कहां से आते हैं। नागा बनते कैसे हैं और इसके क्या विधि-विधान हैं। नागा साधुओं की अपनी ही रहस्यमयी दुनिया है। जिसके बारे में जानने की हमेशा से लोगों के बीच उत्सुकता रही है। इस कुंभ मेले में भी नागा साधु श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बने हैं। हर कोई उनकी झलक पाने को लालायित दिखता है। पढ़ें नागा बनने की क्या है प्रक्रिया....

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naga sadhu - फोटो : amarujala

बेहद लंबी और जटिल है नागा बनने की प्रक्रिया
सिर्फ प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक के कुंभ में ही बनाए जा सकते हैं नागा संन्यासी। अखाड़े में अवधूत के तौर पर पहले शामिल किए जाते हैं नागा बनने के इच्छुक।

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Naga sadhu - फोटो : Reuters

 नागा संन्यासी बनाने की प्रक्रिया बेहद लंबी और जटिल होती है। हर अखाड़े की अपनी मान्यता एवं परंपरा होती है। उसी के अनुसार अखाड़े नागा संन्यासी बनाते हैं। संन्यासी बनने के इच्छुक व्यक्ति को पहले अखाड़े में अवधूत की तरह शामिल किया जाता है। कई अखाड़ों में इनको भुट्टो भी बोला जाता है। शुरुआत में इनको गुरु सेवा के अलावा अखाड़े से जुड़े सभी छोटे काम सौंपे जाते हैं।

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Naga Sadhu

अखाड़ा परंपरा में अच्छी तरह रम जाने के बाद अखाड़ा के कर्ताधर्ता एक बार उसको सामाजिक दुनिया में लौट जाने की सलाह देते हैं लेकिन, जब वह अडिग रहता है तब उसे अगले कुंभ में नागा संन्यासी बनाने के लिए ले जाया जाता है। नागा संन्यासी सिर्फ प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन एवं नासिक कुंभ में ही बनाए जाते हैं। देश भर के संन्यासियों को नागा बनाने के लिए कुंभ में ही एकत्रित किया जाता है। सभी सन्यासी अखाड़ों में नागा दीक्षा की परंपरा करीब-करीब एक ही है।

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Naga Sadhu

सामान्य तौर पर शाही स्नान से पूर्व नागा संन्यासियों को दीक्षित करने की क्रिया होती है। मुहूर्त के मुताबिक नागा संन्यासी बनने के इच्छुक साधुओं को धर्मध्वजा के नीचे स्थापित घट के बासी जल से स्नान कराया जाता है। इसके बाद इनको गंगा किनारे निर्जन स्थान पर ले जाकर पिंडदान कराया जाता है।

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