कुंभ मेले में बाबाओं और संन्यासिनियों की एक अलग दुनिया संगम की रेती पर बसी हुई है। संस्कृति और संस्कार के साथ संन्यासी चोला इनके जीवन का हिस्सा है। संगम तट पर अखाड़ों में नागा संन्यासियों के शिविरों के बीच कुछ साध्वियों ने धूनी भी रमा ली है। यह साध्वियां भस्म-भभूत लगाकर दर्शन नहीं देतीं, लेकिन संन्यास परंपरा का सख्ती से निर्वाह करती हैं। भोर से ही दिनचर्या शुरू हो जाती है। स्नान के बाद धूना लगता है और फिर शुरू हो जाती है साधना। जूना अखाड़े के पास लगे माई बाड़ा में सौ से अधिक साध्वियां देश-दुनिया भर से पहुंची हैं। इन साध्वियों की दुनियां ही अलग है। वहां बिना इजाजत के कोई प्रवेश नहीं कर सकता। आपको रूबरू कराते हैं इन संन्यासिनियों की दिनचर्या से, बताते हैं कि किस तरह कठिन तप से गुजर के ये संन्यासी बनती हैं.... आगे की स्लाइड में पढ़ें...
Kumbh Mela 2019: सांसारिक मोह माया छोड़, कठिन दिनचर्या से गुजर कर बनती हैं महिला संन्यासी
इंद्रियों को वश में कर लेने वाला ही संन्यासी कहलाता है। लेकिन संन्यासी बनना इतना आसान नहीं है। चाहे बाल संन्यासी हों या फिर महिला साध्वी, सभी को सांसारिक मोह माया छोड़कर कठिन तप और निर्धारित दिनचर्या का पालन करना होता है।
दो चरणों में बनतीं हैं महिला संन्यासी
महिला साध्वियों के लिए जूना अखाड़े में एक अलग ही बाड़ा है, जिसे माई बाड़ा के नाम से जाना जाता है। माई बाड़ा में साध्वी की पदवी पाने के लिए दो संस्कार कराए जाते हैं। पहला महापुरुष संस्कार है। जब कोई महिला संन्यासी बनना चाहती है, तो उसके गुरु सबसे पहले अपने आश्रम में उसकी योग्यता परख कर महापुरुष संस्कार कराते हैं। इस संस्कार को करने में एक से दो घंटे का समय लगता है। महापुरुष संस्कार प्राप्त संन्यासी अपने माथे पर दो बिंदियों का टीका लगाती हैं। दूसरा संस्कार विजया हवन संस्कार है। इस संस्कार को पूरा करने में लगभग 24 घंटे लग जाते हैं। यह संस्कार कुंभ के दौरान ही होता है। विजया हवन संस्कार के बाद महिला संन्यासी साध्वी संस्कारी बनती हैं। कुछ साध्वी एक बिंदी वाला टीका लगाती हैं। स्थानधारी जमातिया साध्वी तीन बिंदी या एक बिंदी का टीका लगा सकती हैं।
पगड़ी पहनना जरूरी
साध्वियों के अनुसार महिलाओं की ऊर्जा उनके बालों में होती है। अपनी इस अपार ऊर्जा को केंद्रित और संग्रहीत करने के लिए महिला साध्वी अपने सर पर पगड़ी धारण करती हैं।
पांच वर्ष की आयु पूरी कर ही बन सकते हैं बाल संन्यासी
संगम तीरे अखाड़ों में बाल संन्यासी देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। बाल संन्यासियों को दीक्षा देने की आयु निर्धारित है। किसी को नागापंथ की दीक्षा तब तक नहीं दी जाती जब तक वह बालक या बालिका पांच वर्ष की आयु पूरी न कर ले। इसका पालन प्रत्येक अखाड़ा करता है। कई बार अखाड़े के संत अपने आसपास के अनाथ बच्चों को गोद ले लेते हैं। पर यह जरूरी नहीं की यदि संत ने बालक या बालिका को गोद लिया है तो वह भी संत ही बने। कई बार गोद लिए बच्चों की इच्छानुसार उनका विवाह कर दिया जाता है। यदि बालक या बालिका खुद साधु बनना चाहता है तब ही उसे नागापंथ की दीक्षा दी जाती है।