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संगम की रेती पर संन्यासिनियों का अद्भुत समागम , नेपाल की साध्वियों ने शिविरों में डाला डेरा

Thu, 17 Jan 2019 08:41 AM IST
दुष्यंत शर्मा अनूप ओझा, अमर उजाला, प्रयागराज
अनूप ओझा, अमर उजाला, प्रयागराज Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Thu, 17 Jan 2019 08:41 AM IST
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Kumbh Mela 2019:A different and wonderful world of Lady monk established on sangan coast
Lady Sadhu

कुंभ में महिला संन्यासिनियों की एक अलग और अद्भुत दुनिया बस चुकी है। संस्कृति और संस्कार के साथ संन्यासी चोला इनके जीवन का हिस्सा है। संगम तट पर अखाड़ों में नागा संन्यासियों के शिविरों के बीच कुछ साध्वियों ने धूनी भी रमा ली है। यह साध्वियां भस्म-भभूत लगाकर दर्शन नहीं देतीं, लेकिन संन्यास परंपरा का सख्ती से निर्वाह करती हैं। भोर से ही दिनचर्या शुरू हो जाती है। स्नान के बाद धूना लगता है और फिर शुरू हो जाती है साधना। जूना अखाड़े के पास लगे माई बाड़ा में सौ से अधिक साध्वियां देश-दुनिया भर से पहुंची हैं। इन साध्वियों की दुनियां ही अलग है। वहां बिना इजाजत के कोई प्रवेश नहीं कर सकता।

Kumbh Mela 2019:A different and wonderful world of Lady monk established on sangan coast
Lady Sadhu

हरियाणा के खंडलवा आश्रम से आईं जूना अखाड़े की साध्वी जमातिया मंहत शांति गिरि ने गड़ासा और त्रिशूल धारण कर भस्ती पोते नागाओं के बीच अपना धूना सजाया है। वह महीने भर कुंभ के इस आध्यात्मिक समागम में नागाओं के बीच अपनी साधना करेंगी। बुधवार की दोपहर धूने पर अपनी शिष्याओं के साथ मिलीं महंत शांति गिरि ने अपना जन्म स्थान मध्य प्रदेश बताया। उन्होंने बताया कि ईश्वर की साधना में मन लगने के कारण महज 14 वर्ष की उम्र में ही उन्होंने घर का त्याग कर दिया था। बाद में जूना अखाड़े के दिगंबर तूफान गिरि महाराज से उन्होंने संन्यास की दीक्षा ली और दूसरी दुनिया में पहुंच गईं। नागाओं और महिला संन्यासियों के जीवन में अंतर के सवाल पर वह बताती हैं कि महिला साध्वियों के नग्न होकर रहने या शाही स्नान करने पर प्रतिबंध है।

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Lady Sadhu

अखाड़ों का मानना हैकि यह भारतीय संस्कृति का खुला उल्लंघन है। इसलिए संन्यास संस्कार के बाद महिला साध्वियों को तन पर गेरुआ वस्त्र धारण करना अनिवार्य होता है। नागाओं के अखाड़ों में महिला संन्यासिनियों को एक अलग पहचान तो मिलती ही है, खास महत्व भी दिया जाता है। इन संन्यासिनियों की दुनिया ही अलग है। वहां आम लोगों की आवाजाही पर रोक है। पश्चिम बंगाल से आईं दीपा गिरि भी जूना अखाड़े की संन्यासिनी हैं। वह बताती हैं कि सांसारिक मायामोह के प्रति विरक्ति पैदा होने की वजह से उन्होंने संन्यास धारण कर लिया।

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Lady Sadhu

अब वह मातृशक्ति के बेड़े को मजबूत करने में जुटी हैं। पड़ोसी देश नेपाल से इस बार कुंभ में पचासों की तादाद में संन्यासिनियां पहुंचीं हैं। माई बाड़ा में इनके शिविर लगे हैं। वहां नेपाल की साध्वी सीता गिरि से मुलाकात हुई। बहुत आग्रह के बाद वह अपनी कुछ शिष्याओं के साथ बाहर निकलीं। उन्होंने बताया कि यह दुनिया के सबसे बड़ा संत समागम है। इसमें मानवता और कल्याण की कामना से वह भजन के लिए आई हंै। महीने भर भजन और जप, ध्यान होगा। साध्वी राधा गिरि भोर में चार बजे ही उठकर स्नान के बाद ध्यान में लग जाती हैं।

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Lady Sadhu

छत्तीसगढ़ से आई सिद्धेश्वरी पुरी के साथ भी शिष्याओं की मंडली है। वह कहती हैं कि शांति सिर्फ भगवान के चरण में ध्यान लगाने और भजन करने से मिल सकती है। कुंभ में वह तीनों शाही स्नान कर अपने आश्रम के लिए लौटेंगी। वह कहती हैं कि मायामोह से अलग इस दुनिया में उनको अपने आराध्य का भजन करने में बहुत सुकून मिलता है। अखाड़े में संन्यासिनियों को ऊंचा स्थान प्राप्त है। हर साध्वी को माई कहकर ही पुकारा जाता है। 

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