कुम्भ महापर्व में संगम के तट पर रहकर पूजा-पाठ, दान-पुण्य करने का विशेष विधान कल्पवास कहलाता है, कुछ श्रद्धालु मकर संक्रांति से तो कुछ पौष पूर्णिमा से कल्पवास का व्रत प्रारम्भ करते हैं। कुम्भ के दौरान संगम की रेती पर पौष पूर्णिमा से पूरे माघ मास पर्यन्त कल्पवास करने का विधान है। वस्तुतः कल्पवास तापसी जीवन का पर्याय है, इसके तहत जहां जप, तप, संयमित और अनुशासित जीवन का संकल्प किया जाता है, वहीं कल्पवास में सिर्फ एक समय भोजन और भूमि शयन का भी विधान है।
कुंभ 2019: संगम तट पर कल्पवास करने से मिलता है जीवन का सबसे बड़ा सुख, पढ़ें इससे जुड़ी मान्यताएं
इस दौरान नियमित गंगा स्नान जहां किसी साधना से कम नहीं, वहीं एक योग भी है। एक समय भोजन वह भी सादा तथा भगवद्चर्चा भोर से रात्रि तक मनसा, वाचा, कर्मणा तापसी जीवन। मान्यता है कि कुम्भ महापर्व में माह भर का कल्पवास पूरे जीवन का कायाकल्प कर देता है। प्रयागराज के प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य आशुतोष वार्ष्णेय के अनुसार कल्पवास में दान-पुण्य का भी विशेष महत्व है, इसके तहत गंगा तट पर काष्ठ, कम्बल और तिल का दान पुण्यदायी होता है। कहा जाता है कि कल्पवास, जीवन के अंतिम लक्ष्य का संकेत देने तथा जीवन को अनासक्त भाव से उस दिशा में ले जाने का, एक मास का प्रशिक्षण है।
ग्रह नक्षत्रों के निदेशक ज्योतिषाचार्य गुंजन वार्ष्णेय के अनुसार कल्पवास माघ माह में किए जाने वाला एक ऐसा व्रत है जिसका उद्देश्य तन और मन में उपस्थित विकारों को निकालकर मोक्ष की राह की ओर अग्रसर होना है। कुम्भ में एक महीने का यह व्रत पूरे वर्ष शरीर तथा मन को उर्जा सम्पन्न करता है। प्रयाग के संगम तट पर एक माह रहकर लोग कल्पवास करते हैं। यह परम्परा सदियों से चली आ रही है। कभी-कभी आज की युवा पीढ़ी यह प्रश्न उठाती है कि आखिर ’कल्पवास‘ क्या है? वस्तुतः यह एक ऐसा व्रत है जो प्रयाग आदि तीर्थों के तट पर किया जाता है।
यह बहुत ही कठिन व्रत है, इस व्रत में सूर्योदय से पूर्व स्नान, मात्र एक बार भोजन, पुनः मध्यान्ह तथा सायंकाल तीन बार स्नान का विधान है, परन्तु अधिकांश लोग केवल सुबह, शाम स्नान करते हैं। कल्पवास के व्रत को एक माह में पूर्ण करते हैं। ज्योतिषाचार्य आशुतोष वार्ष्णेय बताते हैं कि कल्पवास का अपना एक अलग विधान है। जो कल्पवासी लगातार बारह वर्ष तक अनवरत कल्पवास करते हैं, वह मोक्ष के भागी होते हैं। एक माह में कल्पवास की पूर्ति कर विशेष रूप से उसका उध्यापन किया जाता है। कर्मकाण्ड अथवा पूजा में हर कार्य संकल्प के साथ शुरू होता है और संकल्प में “श्री श्वते वारह कल्पे” का सम्बोधन किया जाता है।
इस कल्प का तात्पर्य यह है कि सृष्टि के सृजन से लेकर अब तक 11 कल्प व्यतीत हो चुके हैं और बारहवां कल्प चल रहा है। ’कल्प‘ का एक अर्थ तो सृष्टि के साथ जुड़ा है और दूसरे ’कल्प‘ का तात्पर्य कायाकल्प से है। कायाकल्प अर्थात् शरीर का शोधन। इस कल्प को करने का आयुर्वेद में अलग-अलग विधान है। जैसे दुग्ध कल्प जिसमें एक निश्चित समय तक दूध अथवा मट्ठे का सेवन कर शरीर का कायाकल्प किया जाता है और गंगा तट पर रहकर गंगाजल पीकर एक वक्त भोजन, भजन, कीर्तन, सूर्य अर्घ्य, स्नानादि धार्मिक कृत्यों के समावेश से शरीर का शोधन अर्थात् शरीर को आध्यात्मिक चेतना से जोड़ने की प्रक्रिया ही कल्पवास की वैज्ञानिक प्रक्रिया है। बारह वर्ष का अपना ही महत्व है। बारह वर्ष बाद ही कुम्भ महापर्व पड़ता है। कल्पवास की पद्धतियां भी कुछ प्रांतों में भिन्न-भिन्न है। कुछ लोग पौष पूर्णिमा से और कुछ लोग मकर संक्रान्ति से इसे प्ररम्भ करते हैं।