कुंभपर्व में मकर संक्रांति पर मंगलवार को रेती की शान अखाड़ों ने अपनी समृद्ध परंपरा और आस्था के साथ डुबकी लगाई तो यह दृश्य अद्भुत, अलौकिक होने के साथ ही अविस्मरणीय बन गया। संगम पर भोर से कई घंटे पहले ही सवेरे जैसा माहौल था, वहीं अखाड़ों की छावनी में तो रात हुई ही नहीं।
पर्व की पहली डुबकी लगाने को आतुर आचार्य, संत, नागा संन्यासी सभी तैयारी में ही जुटे रहे। संक्रांति पर सभी तेरहों अखाड़ों ने पुण्यार्जन के लिए अपने आराध्य, इष्टदेव, आचार्य और अन्य संतों के साथ संगम पर शाही स्नान किया। सबके लिए निश्चित समय निर्धारित था, जिसके बीच बारी-बारी से अखाड़े पहुंचते और डुबकी लगाकर लौटते रहे।
इस बीच उनकी एक झलक पाने के लिए लोग आतुर रहे। संन्यासियों के अखाड़ों ने संगम पहुंचकर सबसे पहले भालों को जल में स्नान कराया गया। फिर नागा संन्यासियों, आचार्य और महामंडलेश्वरों, संतों, श्रद्धालुओं ने हर-हर महादेव के जयकारों के साथ स्नान किया।
परंपरा के मुताबिक मुहूर्त से नियत समय पर सबसे पहले पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणी भगवान कपिल, आदिगणेश और भालों के साथ आचार्य विशोकानंद भारती की अगुवाई में संगम पर पहुंचा। अन्य महामंडलेेश्वरों, संतों, श्रद्धालुओं ने भी स्नान किया। महानिर्वाणी के साथ ही अटल अखाड़ा के संतों ने भी आचार्य विश्वात्मानंद भारती की अगुवाई में पर्व पर डुबकी लगाई।
आनंद पीठाधीश्वर आचार्य महामंडलेश्वर बालकानंद गिरि और अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरि की देखरेख में पंचायती अखाड़ा श्री निरंजनी और आनंद अखाड़ा के महामंडलेश्वरों, संतों, आचार्यों ने स्नान किया।