मथुरा में एक्सप्रेस वे माइल स्टोन 127 पर हुए भीषण हादसे को नजदीकी से देखने वालों की रूह कांप उठीं। जिंदगी बचाने की जद्दोजहद में बसों के शीशे तोड़कर कूदते लोगों के चेहरों पर दहशत तैर रही थी। इसी बीच एक बस में तेज धमाका हुआ तो लगा मानो बम फट गया हो।
इसके बाद लपटें उठती नजर आईं। बसों में आग की लपटों के बीच फंसे यात्रियों की चीखों से कलेजा कांप उठा। धू-धू करती गाड़ियों में चीखें ही सुनाई आ रही थीं। किसी की हिम्मत जलती बसों के पास जाने की नहीं हो रही थी।
लखनऊ से दिल्ली जा रहे डबल डेकर बस के चालक अमित शर्मा यह बताते हुए जमीन पर बैठ जाते हैं। उनकी बस सबसे आखिरी में जाकर टकराई थी, जिससे अगला शीशा टूट गया, लेकिन सवारियां सुरक्षित थीं। उन्होंने बताया कि तेज धमाके से लगा मानो बम फट गया हो। लेकिन इसके चंद मिनटों के बाद ही आगे की ओर की बसों से आग की लपटें उठती नजर आईं।
लोग बसों की खिड़कियों के शीशे तोड़कर बाहर निकले
चारों तक अफरा तफरी और चीखपुकार मची हुई थी। लोग बसों की खिड़कियों के शीशे तोड़कर बाहर निकलने की जद्दोजहद में लगे थे। इस कोशिश में कई के कांच घुस गए मगर जान बचाने के लिए वह इसकी परवाह नहीं कर रहे थे। बसों से बाहर आए बच्चे बेतहाशा रोए जा रहे थे, लेकिन उन्हें चुप कराने की फुर्सत किसी पर नहीं थी। हमने भी कई यात्रियों को बाहर निकालने में मदद की।
दर्द, चीखें और रुदन
काफी देर तक घायल सड़क पर इधर, उधर पड़े कराहते रहे। कोई अपनों को तलाश रहा था तो कोई घायल पत्नी को ढांढस बंधाने में लगा था। दर्द, चीखें, रुदन के बीच किसी का ध्यान बस में फंसे उन अभागे लोगों की तरफ नहीं गया जोकि आग की लपटों में पूरी तरह घिर चुके थे। जलती बसों से चीखें सुनकर कुछ लोग दौड़े मगर फिर से धमाका हुआ तो अपनी जान बचाने को वापस दौड़ पड़े।
स्थानीय निवासी भगवान दास भी इस अफरा तफरी के बीच पहुंचे तो उन्हें कुछ देर तक समझ नहीं आया कि किसकी मदद करें, बसें आग पकड़ चुकी थीं, घायल कराह और चिल्ला रहे थे। मदद करने वाले हाथ कम थे, सांत्वना देने वाले कंधे भी वहां नहीं थे। इस आपाधापी के बीच मौत का तांडव चल रहा था, बसों में जिंदगियां खाक हो रही थीं। फायर ब्रिगेड की गाड़ियां पहुंचीं तब तक सब कुछ स्वाहा हो चुका था।