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जज्बा: 70 साल की बुजुर्ग सहेलियां लिख रहीं जीवन की नई पटकथा, पढ़ाई का ऐसा जुनून, पहुंच गईं पाठशाला

Sun, 03 Jul 2022 12:01 PM IST
धीरेन्द्र सिंह सिद्धार्थ चतुर्वेदी, आगरा
सिद्धार्थ चतुर्वेदी, आगरा Published by: धीरेन्द्र सिंह Updated Sun, 03 Jul 2022 12:01 PM IST
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literacy 70 year old old friends started studies in agra
बुजुर्ग सहेलियां मंजू और इन्द्रवती - फोटो : अमर उजाला

ताजनगरी की 70 साल की बुजुर्ग सहेलियां इंद्रावती और मंजू जीवन की नई पटकथा लिख रही हैं। उन्हें पढ़ाई की लगन लग गई है। शिक्षा उनके जीवन में नई रोशनी बिखेर रहा है। इंद्रावती ने हस्ताक्षर करना सीख लिया है। मंजू को रुपयों का हिसाब लगाने में मजा आ रहा है। 



दोनों सहेलियों को अपने पोते और नातियों को पढ़ते देखकर प्रेरणा मिली। दो जून को वे पास ही स्थित एक पहल संस्था की पाठशाला में पहुंच गईं और बोलीं, हमें पढ़ना है। पाठशाला के शिक्षक पहले तो चौंक गए फिर उनसे दूसरे दिन आने के लिए कहा। दूसरे दिन वे सबसे पहले पाठशाला पहुंचीं। अब दोनों सहेलियां कागज पर हस्ताक्षर करने से लेकर घर का सामान्य हिसाब खुद करने लगी हैं। घर में रात में जब सभी लोग सो जाते हैं, तो इंद्रावती और मंजू कॉपी में हर रोज पहाड़े लिखती हैं। हिंदी के अक्षरों से शब्द बनाती हैं। 

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इन्द्रवती - फोटो : अमर उजाला

सीखने की कोई उम्र नहीं होती

दयालबाग में सिकंदरपुर निवासी इंद्रावती अक्षर ज्ञान पाकर इतनी खुश हैं कि लोगों को इस बारे में बताते नहीं अघाती। काफी दिनों बाद मिलने वाले परिचित से उनका पहला वाक्य यही होता है, मैं लिखना सीख गई हूं। उन्होंने बताया कि पोते-नातियों को पढ़ते हुए देखकर कमी खलती थी। लगता था कि अगर पढ़ना आता, तो हिसाब लगा पाती। नाम सही से लिख पाती। मेरी सहेली मंजू ने साथ दिया। दोनों ने साथ-साथ पढ़ने का फैसला लिया। मेरा मानना है कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती।   
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मंजू - फोटो : अमर उजाला

अब खुद लगाती हूं हिसाब

दयालबाग स्थित बसेरा के पीछे बस्ती में रहने वाली मंजू इन दिनों घर में पैसे लेते-देते समय खुद हिसाब लगाती हैं। बोलीं कि लाला मेरा हिसाब लगा दे...बोलना बंद कर दिया है। हिसाब करने और हस्ताक्षर करने में बहुत मजा आता है। मुझे लगता है कि मैं भी पढ़-लिख गई हूं।
 
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पूनम सचदेवा - फोटो : अमर उजाला

लगातार चलेगी अक्षरा योजना

समाजसेवी पूनम सचदेवा ने बताया कि महिलाओं को साक्षर करने के लिए अक्षरा योजना की शुरुआत की थी तो हमें उम्मीद नहीं थी कि इतनी अधिक उम्र में भी महिलाएं पढ़ना चाहती हैं। दोनों बुजुर्ग महिलाओं के समर्पण को देखकर इस योजना को लगातार चलाएंगे। 
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मनीष राय - फोटो : अमर उजाला

पहले तो विश्वास नहीं हुआ

एक पहल संस्था के सचिव मनीष राय ने बताया कि दोनों माताएं जब संस्था पहुंची तो किसी को यह विश्वास नहीं हुआ कि पढ़ाई के लिए आई हैं। हम दोनों को पढ़ना है... उनके इस वाक्य को सुनकर कक्षा में बैठीं युवतियां चौंक गईं। अगले दिन से कक्षा में आने के लिए कहा। समय से आधा घंटा पहले पहुंच गई। यह सभी के लिए काफी सुखद रहा।
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