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मैनपुरी के चौबियाना में होती है ब्रज की होली, पांच मोहल्लों में पांच दिन तक मनाया जाता है महोत्सव
Sun, 21 Mar 2021 11:41 AM IST
Abhishek Saxena
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मैनपुरी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मैनपुरी
Published by: Abhishek Saxena
Updated Sun, 21 Mar 2021 11:41 AM IST
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happy holi 2021
- फोटो : istock
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मैनपुरी में होली का त्योहार हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है, लेकिन चौबियाना की होली की बात ही कुछ अलग है। यहां होली महोत्सव पांच दिन तक चलता है। होलिकोत्सव में यहां ब्रज की छटा नजर आती है। पांच मोहल्लों में होली के दौरान ऐसा लगता है कि मथुरा में आ गए हैं। पुरानी मैनपुरी क्षेत्र केे मोहल्ला मिश्राना, चौथियाना, पुरोहिताना, भरतवाल, सोतियाना को चौबियाना मोहल्ला के नाम से जाना जाता है। यहां पांच दिन तक होली खेलने की परंपरा है। रंग भरनी एकादशी के दिन मंदिर बरहा की महाराज से निकलने वाले ठाकुर जी के हिंडोले पर गुलाल से होली खेली जाती है। उसके बाद पूर्णिमा और प्रतिपदा (पड़वा) तक रंग की होली खेली जाती है। होली गायन की परंपरा को चतुर्वेदी समाज के बुजुर्ग और युवा आज भी जीवंत बनाए हुए हैं।
चौपाई गाते गोस्वामी समाज के लोग (फाइल)
- फोटो : अमर उजाला
ठाकुर जी का डोला निकालने की है परंपरा
चौबियाना मोहल्ले में होलिकोत्सव के तहत ठाकुर जी का डोला निकालने की परंपरा है। पूर्णिमा के दिन सोतियाना मोहल्ला स्थित दाऊ जी मंदिर से ठाकुर जी का डोला निकाला जाता है। इसमें क्षेत्रीय लोग शामिल होते हैं और ठाकुर जी के साथ होली खेलते हैं। क्षेत्र भ्रमण करते हुए डोला कृष्णा टॉकीज क्षेत्र स्थित राधा-कृष्ण मंदिर पहुंचता है। यहां ठाकुर जी रात्रि विश्राम करते हैं। पड़वा के दिन यहां से ठाकुर जी का डोला वापस दाऊ जी मंदिर पहुंचता है। ठाकुर जी का डोला निकलने के बाद लोग होली खेलना बंद कर देते हैं।
चौबियाना मोहल्ले में होलिकोत्सव के तहत ठाकुर जी का डोला निकालने की परंपरा है। पूर्णिमा के दिन सोतियाना मोहल्ला स्थित दाऊ जी मंदिर से ठाकुर जी का डोला निकाला जाता है। इसमें क्षेत्रीय लोग शामिल होते हैं और ठाकुर जी के साथ होली खेलते हैं। क्षेत्र भ्रमण करते हुए डोला कृष्णा टॉकीज क्षेत्र स्थित राधा-कृष्ण मंदिर पहुंचता है। यहां ठाकुर जी रात्रि विश्राम करते हैं। पड़वा के दिन यहां से ठाकुर जी का डोला वापस दाऊ जी मंदिर पहुंचता है। ठाकुर जी का डोला निकलने के बाद लोग होली खेलना बंद कर देते हैं।
चतुर्वेदी समाज के लोग
- फोटो : अमर उजाला
मथुरा के चतुर्वेदी समाज से रिश्ता
होली रंगों का त्योहार है, मैनपुरी में चतुर्वेदी समाज का मथुरा के चतुर्वेदी समाज से रिश्ता है। मैनपुरी में मथुरा की तर्ज पर ब्रज की होली खेलने की परंपरा आज भी कायम है। -गजेंद्र चतुर्वेदी, मिश्राना
घरों में घोंटी जाती है भांग
रंगों के त्योहार होली पर समाज के लोगों के बीच भांग का सेवन करने का प्रचलन है। बुजुर्ग और युवा आज भी अपने हाथों से घरों में भांग घोंटकर उसका ही सेवन करते हैं। -मनोज चतुर्वेदी, मिश्राना,
होली रंगों का त्योहार है, मैनपुरी में चतुर्वेदी समाज का मथुरा के चतुर्वेदी समाज से रिश्ता है। मैनपुरी में मथुरा की तर्ज पर ब्रज की होली खेलने की परंपरा आज भी कायम है। -गजेंद्र चतुर्वेदी, मिश्राना
घरों में घोंटी जाती है भांग
रंगों के त्योहार होली पर समाज के लोगों के बीच भांग का सेवन करने का प्रचलन है। बुजुर्ग और युवा आज भी अपने हाथों से घरों में भांग घोंटकर उसका ही सेवन करते हैं। -मनोज चतुर्वेदी, मिश्राना,
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कमलेश एवं राकेश चतुर्वेदी
- फोटो : अमर उजाला
ब्रज की होली की याद दिलाती है
समय के साथ-साथ समाज में बहुत कुछ बदल गया है। चौबियाना में आज भी सामूहिक होली मिलन, होली गायन की परंपरा ब्रज की होली की याद दिलाती है। -कमलेश चतुर्वेदी, चौथियाना
डोला चतुर्वेदी समाज की पहचान
चौबियाना से निकलने वाला ठाकुर जी का हिंडोला ही चतुर्वेदी समाज की पहचान है। पांच दिनों तक चौबियाना में होने वाली होली ब्रज की होली की आज भी याद दिलाती है। -राकेश चतुर्वेदी, चौथियाना
समय के साथ-साथ समाज में बहुत कुछ बदल गया है। चौबियाना में आज भी सामूहिक होली मिलन, होली गायन की परंपरा ब्रज की होली की याद दिलाती है। -कमलेश चतुर्वेदी, चौथियाना
डोला चतुर्वेदी समाज की पहचान
चौबियाना से निकलने वाला ठाकुर जी का हिंडोला ही चतुर्वेदी समाज की पहचान है। पांच दिनों तक चौबियाना में होने वाली होली ब्रज की होली की आज भी याद दिलाती है। -राकेश चतुर्वेदी, चौथियाना
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बरसाना की हुरियारिनें फाइल फोटो
- फोटो : अमर उजाला
ब्रज में फाग: अब चौपाई गायन में नहीं दिखतीं घाघरा और कमीज पहने महिलाएं
मथुरा के नंदगांव और आसपास के क्षेत्र में चौपाई और फाग गायन के दौरान पारंपरिक परिधान घाघरा, ओन्ना और कमीज पहने महिलाएं अब नजर नहीं आतीं। अब इन पोशाकों का स्थान सूट सलवार ने ले लिया है। करीब दो दशक पूर्व तक वसंत पंचमी लगते ही चौक चौराहों पर चौपाई, होली और सांखियों का दौर शुरू हो जाता था। अब चौपाई गायन सिर्फ परंपरा निभाने तक सीमित है। चौपाई गाने वाली मंडलियां दूरदराज से आती थीं। रात-रात भर चौपाई और फाग गायन होता था। इस दौरान महिलाएं जाट समाज की महिलाएं घाघरा, ओन्ना और कमीज पहने होती थीं। इन सबके ऊपर वे ब्रज की ओढ़नी ओढ़ती थीं। पैरों में चांदी के कडूला, छैलकरे, हाथों में बाजूबंद, गले में सोने की मुहर, माथे पे टीका, नाक में नथनी, कानों में सोने के कुंडल, कमर में कौंदनी, हाथों में हथफूल आदि गहने पहने महिलाएं सोलह शृंगार से सुसज्जित होकर चौपाई के हुरियारों के सामने पहुंचती थीं।
मथुरा के नंदगांव और आसपास के क्षेत्र में चौपाई और फाग गायन के दौरान पारंपरिक परिधान घाघरा, ओन्ना और कमीज पहने महिलाएं अब नजर नहीं आतीं। अब इन पोशाकों का स्थान सूट सलवार ने ले लिया है। करीब दो दशक पूर्व तक वसंत पंचमी लगते ही चौक चौराहों पर चौपाई, होली और सांखियों का दौर शुरू हो जाता था। अब चौपाई गायन सिर्फ परंपरा निभाने तक सीमित है। चौपाई गाने वाली मंडलियां दूरदराज से आती थीं। रात-रात भर चौपाई और फाग गायन होता था। इस दौरान महिलाएं जाट समाज की महिलाएं घाघरा, ओन्ना और कमीज पहने होती थीं। इन सबके ऊपर वे ब्रज की ओढ़नी ओढ़ती थीं। पैरों में चांदी के कडूला, छैलकरे, हाथों में बाजूबंद, गले में सोने की मुहर, माथे पे टीका, नाक में नथनी, कानों में सोने के कुंडल, कमर में कौंदनी, हाथों में हथफूल आदि गहने पहने महिलाएं सोलह शृंगार से सुसज्जित होकर चौपाई के हुरियारों के सामने पहुंचती थीं।